आपका हक : कोर्ट बना महिलाओं का सुरक्षा कवच

आजादी के बाद से अदालत के प्रगतिशील निर्णयों ने विधायिका को महिलाओं के अधिकारों को बनाए रखने के लिए कानूनों की रूपरेखा बनाने में भी मदद की है।

By: विकास गुप्ता

Published: 07 Apr 2021, 08:42 AM IST

आभा सिंह

सुप्रीम कोर्ट लगातार देश में महिलाओं के अधिकारों और सम्मान को बनाए रखने वाले निर्णय और आदेश दे रहा है। आजादी के बाद से अदालत के प्रगतिशील निर्णयों ने विधायिका को महिलाओं के अधिकारों को बनाए रखने के लिए कानूनों की रूपरेखा बनाने में भी मदद की है। गौरतलब है कि जब एक न्यायिक निकाय एक आदेश देता है, तो वह आदेश पक्षकारों के लिए बाध्यकारी हो जाता है। ऐसे मामलों से अक्सर केंद्र या कोई राज्य सरकार जुड़ी होती है। इस तरीके से न्यायपालिका महिलाओं के अधिकारों को बनाए रखने के लिए कानून की व्याख्या करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। साथ ही कानून बनाने वाली संस्थाओं को कानून बनाने के लिए एक कानूनी प्रोत्साहन प्रदान करती है, जिससे महिलाओं को सुरक्षा मिलती है। निचली अदालतों के लिए भी मिसाल कायम होती है और उनके लिए एक तरह से गाइडलाइन भी बन जाती है।

कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीडऩ से सुरक्षा प्रदान करने वाले सबसे महत्त्वपूर्ण मामलोंं में से एक विशाखा बनाम राजस्थान राज्य का मामला एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। इसके कारण 1997 में सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यस्थल पर काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा के लिए दिशा-निर्देशों को तैयार किया। उन्हें विशाखा दिशा-निर्देश के रूप में जाना जाता है, जिनका पालन नियोक्ताओं के लिए अनिवार्य किया गया। ये दिशा-निर्देश अंतत: कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीडऩ (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 का आधार बने। यह उन लाखों भारतीय महिलाओं की रक्षा करने के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कानून है, जो अपने घर से बाहर जाकर काम करती हैं।

एक अन्य ऐतिहासिक मामला लक्ष्मी बनाम भारत संघ (2006) है। एसिड हमले की शिकार लक्ष्मी ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें एसिड हमले में बचे लोगों की बेहतरी के लिए प्रार्थना की गई, पीडि़ता को पर्याप्त मुआवजे की मांग की गई। साथ ही एसिड की बिक्री को विनियमित करने के उपायों के लिए विनती की गई। वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने अंतत: महिलाओं पर एसिड हमलों के मामलों में वृद्धि का संज्ञान लिया। अदालत ने एसिड की बिक्री पर कड़े नियम लागू किए, जिसमें काउंटर पर एसिड की बिक्री पर प्रतिबंध शामिल था। अब डीलर वैध पहचान प्रमाण और खरीद की आवश्यकता के बाद ही किसी को एसिड की बिक्री कर सकते हैं। साथ ही डीलर को तीन दिन के भीतर बिक्री का विवरण पुलिस को सौंपना अनिवार्य है।

शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को गैर-इस्लामिक और कुरान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ घोषित किया। इसी के परिणाम स्वरूप मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 संभव हुआ। साफ है कि जब भी सरकार या अन्य कोई एजेंसी महिला विरोधी कानून, नियम या आदेश देती है तो न्यायपालिका तुरंत ही महिलाओं के बचाव में आ जाती है।

(लेखिका सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं)

विकास गुप्ता
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