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आपकी बात…शहरों के विस्तार के कारण किस तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं ?

पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं मिलीं, पेश है चुनींदा प्रतिक्रियाएं…

जयपुरJun 17, 2024 / 04:31 pm

विकास माथुर

प्रकृति से हो रहे विमुख
शहरीकरण के विस्तार के साथ ही लोग प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। बिल्डिंगों के निर्माण के चलते शहरों की हरियाली खत्म सी हो गई है। आबादी बसने से जल संकट गहरा रहा है। वाहनों से धूल और धुआं बढ़ रहा है। इससे आने वाली पीढ़ी कई तरह की बीमारियों से ग्रसित हो गई है। सौंदर्यीकरण के नाम पर सड़कों को कंक्रीट से ढक दिया गया है। पीने के पानी की भी समस्या है।
—आशुतोष शर्मा एडवोकेट, जयपुर
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भूमिगत जल दोहन में बढ़ोतरी
शहर विस्तारीकरण में झीलों, तालाबों, कुओं जैसे जल स्रोतों को पाटकर कंक्रीट का जाल बिछाने से भूमिगत जल का दोहन बढ़ जाता है। वाहनों की संख्या बढ़ने से वायुप्रदूषण, वृक्षों की कटाई से हरित क्षेत्र की कमी, स्वास्थ्य संबधी समस्याएं, अपराधीकरण वृद्धि, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में कमी आदि अनेक संकट जन्म लेते हैं। सरकारों और स्थानीय प्रशासन के समन्वित प्रयासों से इन समस्याओं और संकटों से छुटकारा भी मिल सकता है।
मुकेश भटनागर, भिलाई, छत्तीसगढ
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पारिस्थितिकी असंतुलन की समस्या
शहरों का विस्तार कई चिंताओं को जन्म दे रहा है। सबसे बड़ी हानि पर्यावरण को हो रही है। अधिक संख्या में पेड़ों की कटाई से ऑक्सीजन के स्तर में कमी के साथ तापमान भी बढ़ रहा है। मानव आवास और फैक्ट्रियों की स्थापना के लिए वन्य जीवों के आवास उजाड़ने से पारिस्थितिकी असंतुलन की समस्या भी सामने आ रही है।
. चंद्रभान बिश्नोई, जोधपुर
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पर्यावरण और विकास के बीच असंतुलन
बढ़ते शहरीकरण ने स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और अन्य बुनियादी जरूरतों के विस्तारीकरण के लिए बाध्य किया है। इन बढ़ती जरूरतों और संवृद्धि की आकांक्षा ने निश्चित रूप से कई चुनौतियों को उत्पन्न किया है। इसमें सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करना है। बीते दो दशकों के दौरान लोगों ने शहरों से सटे खेतों पर अवैध कॉलोनी काट ली है। शहर में जहां कहीं भी सड़क बनी उसके आसपास के खेत, जंगल, तालाब को वैध या अवैध तरीके से कंक्रीट के जंगल में बदल दिया गया। शहरों की घनी आबादी संक्रामक रोगों के प्रचार का आसान जरिया बन जाते हैं।
— हिम्मत सिंह टेवाली, पाली, राजस्थान
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नदियों व तालाबों का जल हो रहा कम
शहरों के विस्तार के साथ—साथ हरियाली खत्म हो रही है। खेती की जमीन भी कम होने लगी है। धीरे-धीरे पृथ्वी का तापमान भी पहले की अपेक्षा बढ़ने लगा है। कई नदियां सूखकर बरसाती नाला बनती जा रही हैं। पुराने तालाब और झीलें भी अपना अस्तित्व खोने लगे हैं ।
-संजय डागा, हातोद
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सार्वजनिक उपयोगिताओं पर अत्यधिक जनसंख्या दबाव
शहरों के विस्तार के कारण मौजूदा सार्वजनिक उपयोगिताओं पर अत्यधिक जनसंख्या दबाव है। परिणाम स्वरूप स्लम बस्ती, अपराध, बेरोजगारी, अस्वस्थता , प्रदूषण, गरीबी और अन्य मानवीय सामाजिक गतिविधियों जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं। शहरीकरण के कारण जो चीज आसानी से उपलब्ध हो जाती थी, अब वह दिनों दिन कीमती होती जा रही है।
  • तरुणा साहू, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़
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वन्यजीव असुरक्षित
शहरों के विस्तार के कारण वन्यजीव असुरक्षित होते जा रहे हैं। वन्यजीवों के शहरों में आ जाने की खबरें पिछले कुछ वर्षों से बढ़ गई हैं। शहरों के विस्तार से पर्यावरण खत्म हो रहा है।
-कृत भट्ट, बांसवाड़ा, राजस्थान
शहरों पर आबादी का दबाव ​अधिक
बढ़ते शहरों के विस्तार से आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक समस्याएं दिन—प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। गांवों से आबादी के शहरों की ओर पलायन से दबाव बढ़ रहा है। इसमें पानी की समस्या व पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा है। पेड़ों की कटाई में बढ़ोतरी हो रही है। इसी से ग्लोबल वार्मिंग जैसी घटनाएं बढ़ रही हैंं।
— मधुर साहू ,भोपाल

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