'गारंटीड इनकम प्लान' से डरना चाहिए युवाओं को

शासन से लोगों को इस रूप में जितना ज्यादा पैसा मिलेगा, उतना ही उनके व्यवहार पर असर पड़ेगा और ज्यादातर यह प्रतिकूल होता है।
जनहित में नहीं यूनिवर्सल बेसिक इनकम।

By: विकास गुप्ता

Published: 20 Jul 2021, 09:17 AM IST

एलिसन श्रेगर, स्तम्भकार ब्लूमबर्ग

गरीबी उन्मूलन का एक सीधा सरल आदर्शवादी उपाय है कि प्रत्येक व्यक्ति को हर महीने एक तय राशि का चेक दे दिया जाए। इस तरह हम लोक कल्याण की जटिल व त्रुटिपूर्ण स्थिति में उलझने से भी बच जाएंगे। अमरीका का मिनीपोलिस शहर इस बात का ताजा उदाहरण है, जहां फेडरल रिलीफ फंड के जरिए 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' (यूबीआइ) लागू करने पर विचार किया जा रहा है और पायलट प्रोग्राम के तहत निम्न आय वर्ग के 150 बेरोजगारों को 18 माह के लिए 500 डॉलर प्रतिमाह देने का प्रस्ताव है। (इस बीच कैलिफोर्निया गारंटीड इनकम प्लान को मंजूरी देने वाला अमरीका का पहला राज्य बन गया है।)

इस विषय पर बहस छिड़ गई है। यूबीआइ महंगा साबित होगा और हो सकता है इससे लोग काम न करने की ओर प्रवृत्त होने लगें। इससे अनजाने में ही असमानता को बढ़ावा मिलेगा और सामाजिक अस्थिरता की आशंका है। आलोचकों की मानें तो अच्छी-खासी लागत वाला यूबीआइ हितकर होने के बजाय नुकसानदेह साबित हो सकता है। हालांकि मिनीपोलिस का यूबीआइ पायलट प्रोग्राम सिर्फ एक-दो साल के लिए है और इसका अस्थायी होना लोगों की प्रतिक्रिया को बदलेगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि लोगों के ज्यादातर वित्तीय और कामकाजी निर्णय उनकी जीवनपर्यंत आय के आधार पर होते हैं, न कि कुछ माह मिलने वाली अतिरिक्त नकद राशि के आधार पर।

नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च ने अपने एक ताजा अध्ययन में यूबीआइ की तुलना लॉटरी से की। अर्थशास्त्रियों ने पांच साल तक लॉटरी विजेताओं पर अध्ययन किया। उन्होंने अनुमान लगाया कि औसत जीत सालाना अतिरिक्त 7,800 डॉलर के करीब है, जो कि यूबीआइ प्रस्तावों की ही तरह है। लाभार्थियों का चयन भी रैंडम आधार पर होता है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, लॉटरी जीतने वाले लोग जीती हुई रकम से कोई नया व्यापार या रचनात्मक काम शुरू नहीं करते, बल्कि कम काम करने लगते हैं और इसके लिए नौकरी तक बदल लेते हैं, फिर भले ही उसमें वेतन कम हो। कई लोग लॉटरी जीतने के बाद ग्रामीण इलाकों में चले जाते हैं। कुछ ही ऐसे मिले, जिन्होंने बेहतर इलाकों का रुख किया जहां खुद उनके और उनके बच्चों के लिए पड़ोस, कॉलेज, औसत आय और अन्य मानदंडों के लिहाज से बेहतर भविष्य के अवसर मौजूद थे।

किसी देश में इस तरह रहने का विचार कि कम काम करना पड़े, कुछ लोगों की नजर में ज्यादा बुरा नहीं है। कभी-कभी कम वेतन वाली नौकरी के कुछ फायदे भी हो सकते हैं जैसे ज्यादा लचीलापन और परिवार के साथ ज्यादा वक्त गुजारने का मौका। लेकिन कम वेतन वाली और कम काम वाली नौकरी करने का मतलब है - नए कौशल सीखने और वेतन वृद्धि के बारे में भूल जाइए। युवाओं के लिए यह स्थिति ठीक नहीं। 20 से 30 साल तक की उम्र में वेतन वृद्धि की अच्छी संभावनाएं रहती हैं लेकिन अगर इस समय पिछड़ गए तो भरपाई करना मुश्किल है।

हमारी लोक कल्याण व्यवस्था भले ही अपूर्ण हो लेकिन जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर जरूरत के मुताबिक आकस्मिक भुगतान बेहतर विकल्प है। इसकी लागत भी बहुत कम है क्योंकि ऐसा करने पर यूबीआइ की तरह उन लोगों को पैसा नहीं देना पड़ता, जिन्हें जरूरत है ही नहीं। शासन से लोगों को इस रूप में जितना ज्यादा पैसा मिलेगा, उतना ही उनके व्यवहार पर असर पड़ेगा और ज्यादातर यह प्रतिकूल ही होता है। अधिकांश लॉटरी विजेता बजाय अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के दिवालिया होते ही देखे गए हैं। कई को अवसाद व स्वास्थ्य संबंधी अन्य तकलीफें घेर लेती हैं। यह यूबीआइ लागू करने की चुनौतियों से रूबरू कराता है। एक बार यदि यूबीआइ की आदत पड़ जाए तो इसे वापस लेना बहुत मुश्किल है और ऐसा करना लोगों को पहले से बदतर हालत में ला सकता है।

विकास गुप्ता
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