scriptyouth should be given priority in climate related activities | जलवायु संबंधी गतिविधियों में मिले युवाओं को प्राथमिकता | Patrika News

जलवायु संबंधी गतिविधियों में मिले युवाओं को प्राथमिकता

युवाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के अलावा, युवाओं के सुझावों पर निगाह रखने और उन्हें लागू करने पर भी ध्यान देना चाहिए।

Published: June 02, 2022 11:13:53 pm

भुवन रविंद्रन
रिसर्च एनालिस्ट, काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवारनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू)

कुरिंजी सेल्वराज
प्रोग्राम एसोसिएट, काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवारनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू)

लगभग 50 साल पहले यानी वर्ष 1972 में मानव पर्यावरण पर स्टॉकहोम में हुए संयुक्त राष्ट्र के पहले वैश्विक सम्मेलन में विभिन्न देशों ने प्रकृति पर त्वरित आर्थिक विकास के नकारात्मक प्रभावों को स्वीकार किया था और पर्यावरण को बचाने का वादा किया था। पर क्या इस वादे की नेकनीयती, इंसानी लोभ और अहंकार की शक्तियों के सामने टिक पाई? 1970 के बाद से, मानव आबादी और इससे जुड़ा कार्बन उत्सर्जन दोगुना हो चुका है, जबकि वन्यजीवों की आबादी में लगभग 70 फीसदी घट चुकी है। इतना ही नहीं, 1960 में जन्मे बच्चे की तुलना में 2020 में पैदा हुए बच्चों के सामने लगभग सात गुना ज्यादा हीटवेव और तीन गुना ज्यादा बाढ़ के जोखिम मौजूद हैं।
स्टॉकहोम सम्मेलन 2022
स्टॉकहोम सम्मेलन 2022
आज और कल (2-3 जून), दुनिया भर के देश स्टॉकहोम घोषणा के पचास वर्षों की समीक्षा करने के लिए एक बार फिर स्टॉकहोम में जुट रहे हैं। इस ऐतिहासिक सम्मेलन के लिए, काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) और स्टॉकहोम इनवायरनमेंट इंस्टीट्यूट (एसईआइ) के युवा लेखकों ने एक रिपोर्ट 'चार्टिंग अ यूथ विजन फॉर ए जस्ट एंड सस्टेनेबल फ्यूचर' प्रकाशित की है। इसमें 90 से ज्यादा देशों में लगभग 1,000 युवाओं के बीच किया गया एक सर्वेक्षण शामिल है, जो बताता है कि लगभग 90 प्रतिशत युवाओं ने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव सीधे तौर पर महसूस किए, जबकि 68 प्रतिशत ने कहा कि उनकी सरकारें पर्याप्त रूप से काम नहीं कर रही हैं। वहीं, 57 प्रतिशत युवाओं ने जलवायु संकट के कारण चिंताजनक स्थितियों का अनुभव किया, जो उनमें बेबसी और भय की भावना को उजागर करता है।
जैसा कि इंटरगवर्नमेंटल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज (आइपीसीसी) की छठी रिपोर्ट बताती है कि 2030 की ओर संयुक्त राष्ट्र की दशकीय कार्रवाई, जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए हमारे पास आखिरी मौका है। इसलिए, अब युवाओं को निर्णय प्रक्रिया में बड़ी भूमिका देने का वक्त आ गया है, क्योंकि उन्हें ही जलवायु निष्क्रियताओं के परिणाम भुगतने होंगे। चूंकि, भारत की 80 प्रतिशत आबादी जलवायु की चरम घटनाओं की चपेट में है, इसलिए उसे ही इस दिशा में अपने प्रयास से दुनिया के सामने उदाहरण पेश करना चाहिए।
पहले कदम के तहत, युवाओं की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित की जाए। यह उन्हें उनके जीवन पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की व्याख्या करने में सक्षम बनाएगा और भविष्य के लिए उनके निर्णयों का भी मार्गदर्शन करेगा। इसके अलावा, पाठ्य-पुस्तकों में नवीनतम वैज्ञानिक निष्कर्ष और जलवायु संकट के समाधान शामिल करने की जरूरत है। इससे छात्रों को वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के परिणामों के बारे में शिक्षित करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, वीडियो कॉलिंग प्रौद्योगिकी की मदद से एकजुटता, सहानुभूति और वैश्विक नागरिकता की संस्कृति और विभिन्न जलवायु जोखिम वाले क्षेत्रों के युवाओं के बीच वैचारिक आदान-प्रदान को बढ़ाया जा सकता है।
दूसरा, स्थानीय, राष्ट्रीय व वैश्विक स्तरों पर निर्णय लेने वाली जगहों पर युवाओं के बढ़े हुए प्रतिनिधित्व को सुव्यवस्थित तरीके से प्रोत्साहन और कानूनी गारंटी देनी चाहिए। इसे पंचायतों, नगर पालिकाओं, राज्यों व राष्ट्रीय विधायिकाओं के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलनों के लिए सरकारी प्रतिनिधिमंडलों के स्तर पर भी अपनाना चाहिए। इससे युवाओं को जलवायु परिवर्तन रोकने के प्रति निष्क्रियता से उपजी असंतोष की भावना दूर करने के लिए क्षमता विकास में मदद मिलेगी। यह उन्हें निर्णय लेने वाले मंचों में भागीदारी के लिए प्रासंगिक नीतियों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को जानने, और ज्यादा सतत जीवनशैली के विकल्पों को अपनाने व अपने उदाहरणों से नेतृत्व करने के लिए संवेदनशील बनाने में सहायक होगा। युवाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के अलावा, युवाओं के सुझावों पर निगाह रखने और उन्हें लागू करने पर भी ध्यान देना चाहिए।
तीसरा, युवा उद्यमियों की अगुवाई वाले विभिन्न 'हरित' व्यवसायों या स्टार्ट-अप को किफायती वित्तीय संसाधन, बुनियादी ढांचे तक पहुंच और सलाह व नेटवर्किंग जैसे अवसरों की सहायता दी जानी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) का एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में 56 प्रतिशत युवा उद्यमी, व्यावसायिक उपक्रमों के माध्यम से किसी न किसी सामाजिक समस्या को हल करना चाहते हैं, लेकिन सिर्फ 47 प्रतिशत ही अगले छह महीने से ज्यादा समय तक टिके रहने का भरोसा जताते हैं। युवा उद्यमी ज्यादा प्रतिस्पर्धी व्यवसायों को बढ़ावा दे सकते हैं और एकाधिकार समाप्त करने के साथ-साथ नई मांग पैदा कर साझा समृद्धि के वाहक बन सकते हैं।
निश्चित तौर पर, स्टॉकहोम प्लस 50 सम्मेलन, प्रकृति के साथ सद्भाव के साथ जीने के भूले हुए वादे को पुनर्जीवित करने और युवाओं की भूमिका को मुख्यधारा में लाने के प्रयासों को जमीन पर उतारने वाला होना चाहिए। एक अस्त-व्यस्त धरती भले ही हमें धरोहर में मिली हो, लेकिन यह यकीनन अगली पीढ़ी के लिए हमारी विरासत नहीं होगी।

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