लॉकडाउन में सुनाई देगी घंटियां, गांवों में फिर दौड़ेगी बैलगाड़ी, पढ़ें पूरी खबर...

- कोरोना पॉजिटिव इफेक्ट
- किसान फिर से परम्परागत साधनों से जुड़ रहे
- सवराड़ का परिवार बैलगाड़ी निर्माण की कला को बढ़ा रहा आगे

By: Rajkamal Ranjan

Updated: 28 May 2020, 03:04 PM IST

-गजेन्द्रसिंह गहलोत
पाली/सोजतरोड। सदियों तक यातायात व माल ढोने का सुगम साधन रही बैलगाड़़ी [ Bullock cart ] का स्थान भले ही तेज रफ्तार से चलने वाली गाडिय़ों और ट्रैक्टरों ने ले लिया हो। लेकिन, कोरोना [ Corona virus Outbreak ] के लॉकडाउन [ Lockdown ] ने तो किसानों को फिर से बैलगाडिय़ों की याद दिला दी है। ये ही कारण है कि कुछ किसान जहां फिर से बैलगाडिय़ों की मरम्मत करवा रहे हैं, तो कुछ ने बैलगाड़ी के निर्माण के लिए कारीगरों को ऑर्डर भी दिए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में फिर से गांवों में बैलगाड़ी को हांकने वाले बैलों के गले में बंधी घंटियां सुनाई देगी। खेतीबाड़ी की काष्ठ कारीगरी में रत पाली जिले के सोजतरोड से सटा सवराड़ गांव का एक परिवार इन दिनों बैलगाड़ी बनाने में जुट गया है।

सोजतरोड से सटे सवराड़ गांव में मिश्रीलाल जांगिड़ का परिवार कारीगरी का काम करता है। खासकर खेती-बाड़ी में काम आने वाले यंत्रों का निर्माण करता है। जीवन के 57 बसंत देख चुके मिश्रीलाल की मानें तो मशीनीकरण के बावजूद लॉकडाउन में फिर से किसानों को परम्परागत औजारों की याद आने लगी है। क्षेत्र के ही भंवरलाल सीरवी ने नई बैलगाड़ी बनाने का ऑर्डर दिया था, जो लगभग तैयार हो चुकी है। सिर्फ रंग-रोगन ही बाकी रहा है।

मिट्टी के ढेले तोडऩे और बाड़ बनाने में भी लकड़ी के औजार कारगर
मिश्रीलाल अपने यहां लकड़ी के बैवला, जुताई के लिए हल, मिटटी के ढेलों को तोडऩे वाले औजार के साथ ही बैलगाड़ी बनाते हैं। बच्चों के झूला झूलने वाली घोड़ी यानी झूले भी बनाते हैं। इस काम में उनके पुत्रों के साथ ही पोते भी हाथ बंटाते हैं। पूरे जिले में गिने-चुने कारीगर ही है, जो छकड़ा गाड़ी की निर्माण कला को जानते हैं। उनकी मानें तो जो औजार लोहे के होते हैं, उनमें जंग लगने का डर रहता है।

पर्यावरण को प्रदूषण का नहीं खतरा
गांवों के कच्चे और उबड़ खाबड़ और टेढ़े मेढ़े रास्ते पर बैलों के कंधे के सहारे चलने वाली बैलगाड़ी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। जहां मशीन चालित वाहनों से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, वहीं परम्परागत साधन तो पर्यावरण के सच्चे मित्र है। ये छकडा गाड़ी किसानों की फसल को घर तक पहुंचाने का इन दिनों सुगम साधन बनी हुई है।

परम्परागत औजारों का विकल्प नहीं
हर काम मशीन से नहीं होता। पिछले दो महीने में किसानों को फिर से परम्परागत वाहनों की याद आने लगी है। ये खुशी की बात है। इससे परम्परागत कला को फिर से जीवनदान मिल सकेगा। खेती-बाड़ी में तो परम्परागत साधनों और औजारों का कोई विकल्प ही नहीं है।

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