अश्वपालकों के लिए फरिश्ता बने विदेशी सैलानी, अमेरिका, यूके और फ्रांस समेत कई देशों से यों दिया सहारा

Horse rideing और village safari 'लॉकÓ

By: rajendra denok

Updated: 24 Jul 2021, 04:36 PM IST

राजेन्द्रसिंह देणोक

पाली. घुड़सवारी करते हुए विलेज सफारी यानी राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति निहारने का विदेशी सैलानियों में बड़ा क्रेज रहता है। कोविड-19 के कारण पिछले डेढ़ साल से Horse rideing और village safari 'लॉकÓ है। महामारी के कारण आर्थिक परेशानी झेल रहे अश्वपालकों के लिए केन्द्र व राज्य सरकारें तो कोई राहत नहीं दे पाई, लेकिन सैलानी फरिश्ता बनकर उभरे हैं। अश्वपालकों को आर्थिक मदद मुहैया करवाकर उन्होंने मानवता और पशुप्रेम का अनूठा उदाहरण दिया है। वे अश्पालकों को भरोसा और दिलासा भी दे रहे हैं कि विकट समय में वे उनके साथ खड़े हैं।
हर सैलानी का फेवरिट घोड़ा, वीडियोकॉल से ले रहे खैर-खबर

घुड़सवारी के शौकीन प्रत्येक सैलानी की पसंद का एक खास घोड़ा होता है। वे अपनी पसंद के अनुसार उसका नाम भी रखते हैं। कोरोनाकाल से वे वीडियोकॉल से अपने पसंदीदा घोड़े की देखभाल कर रहे हैं। अश्वपालक से समय-समय पर उसकी जानकारी लेते हैं। एक तरह से वे खुद को घोड़े का संरक्षक मानते हैं। घोड़ों के स्वास्थ्य और खान-पान की उन्हें पूरी चिंता रहती है।

सैलानियों के मन भाए मारवाड़ी घोड़े
कुंभलगढ़ से जवाई बांध नया पर्यटन सर्किट विकसित हुआ है। हरियाली, जंगल और ग्रामीण संस्कृति इस इलाके की खासीयत है। यहां आने वाले सैलानी घुड़सवारी करना कतई नहीं भूलते। अकेले सोनाणा खेतलाजी, नारलाई, घाणेराव इलाके में सालाना हजारों विदेशी घुड़सवारी का लुत्फ उठाने आते हैं। फ्रांस, अमेरिका, यूके, आयरिश, स्कॉटलैंड समेत कई देशों से विदेशियों की हर साल काफी तादाद में आवक रहती है। मारवाड़ी घोड़ों के कानों की सुंदरता के कारण

सात समंदर पार से कर रहे चिंता

विदेशी सैलानी सात समंदर पार से अश्वपालकों और अश्वों की चिंता कर रहे हैं। कोरोना में अश्वों की देखभाल के लिए कई सैलानियों ने आर्थिक सहायता भी भेजी है। इससे काफी संबल मिला है। कोनोरा महामारी के कारण यह काम पूरी तरह से चौपट हो गया।
अजीतसिंह राव, अश्वपालक, नारलाई-सोनाणा खेतलाजी

rajendra denok Reporting
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