पॉजिटिव स्टोरी : सरकारी स्कूल के शिक्षक की अनुकरणीय पहल-खुद अभावों में पले-बढ़े, अब जरूरतमंद बच्चों के चेहरे पर ला रहे हैं मुस्कान

-सरकारी स्कूल के एक शिक्षक की अनुकरणीय कोशिश

 

By: rajendra denok

Published: 01 Jul 2019, 05:16 PM IST

राजेन्द्रसिंह देणोक

पाली. अभावों में पल-पढ़ कर मंजिल हासिल करने वाले शख्स सिर्फ खुद के लिए ही नहीं जीते। उनके जीवन का असली मकसद तभी पूरा होता है जब वे किसी जरूरतमंद के लिए मददगार बन सकें।
ऐसी ही बिरली शख्सियत है राजकीय चीमा बाई संचेती मिल एरिया स्कूल, पाली के शिक्षक जबरसिंह राठौड़। खुद अभावों में पले-पढ़े, इसलिए स्कूल के गरीब बच्चों के लिए फरिश्ता बने हुए हैं।

नाडोल के निकट गुड़ा पृथ्वीराज गाँव हाल पाली निवासी सिंह की 28 साल की नोकरी में यह छठी पोस्टिंग हैं। 1991 में कम उम्र में ही उनकी शिक्षक के रूप में उनकी नोकरी लग गई। जिन-जिन स्कूलों में रहे जरूरतमंद बच्चों को स्कूल यूनिफार्म, पाठ्यसामग्री इत्यादि के रूप में मदद पहुंचाई। यहाँ तक कि कई बच्चों के स्कूल की फीस व अन्य खर्च भी स्वयं ही उठाते हैं। कई ऐसे बच्चे भी है जिनके घरों की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। उनको अनाज ओर आर्थिक सहयोग मुहैया कराने में भी पीछे नहीं हटे। साल में एक या दो बार बच्चों को भोजन भी कराते हैं।
मजे की बात यह कि वे अपना मिशन गुपचुप चलाते हैं। जरूरतमंद बच्चों को गोद लेने की भनक स्टाफ को भी नहीं लगने देते। उनका मानना है बच्चों में किसी तरह की हीन भावना न आए।


खासियत ये भी : रिजल्ट शत प्रतिशत

सिंह की एक ओर खासियत है कि वे अपने स्कूल का परीक्षा परिणाम सुधारने की पूरी कोशिश करते हैं। खासतौर से खुद के विषय में उन्होंने हमेशा शत प्रतिशत परिणाम दिया। केरला गांव में सर्वाधिक 14 साल सेवाएं दी। यहाँ गणित में उन्होंने रिजल्ट हमेशा सौ फीसदी दिया। एक साल पहले ही चीमा बाई स्कूल में कार्यभार संभाला। यहां भी एक साल में ही सामाजिक विषय का परीक्षा परिणाम 95 फीसदी तक पहुंचा दिया। अन्य स्कूलों में भी उनका परीक्षा परिणाम बेहतर रहा है।



किसान पिता के आदर्शों पर चल रहे

सिंह के पिता किसान थे। माता-पिता दोनों ही अशिक्षित। इसके बावजूद पांच भाइयों को मुश्किल हालातों में भी पढ़ाया। सबसे बड़े भाई शैतानसिंह डेयरी में सेवाएं दे रहे। जेठूसिंह होम्योपैथी डॉक्टर है। जालम सिंह फार्म हाउस चलाते है तथा बाघसिंह ऑटोमोबाइल व्यवसायी है।


मदद करता हूँ तो मिलती ऊर्जा

पिता से बढ़कर कोई आदर्श नहीं हो सकता। पिता ही मेरे अादर्श हैं। उन्होंने मुश्किल परिस्थितियों में भी पढ़ाया-लिखाया। बचपन की वही संवेदनाएं मुझमें जिंदा है। आज भी विभिन्न कारणों से हज़ारों बच्चों की परवरिश ठीक से नहीं होती। ऐसे में यदि किसी बच्चे के चेहरे पर मुस्कान ला सकूं। किसी की जिंदगी संवारने में छोटा सा योगदान दे सकूं, इससे बड़ा शौभाग्य मेरे लिए कोई और नहीं हो सकता। इससे मुझे ऊर्जा और अंदरूनी ताकत मिलती हैं। अात्मीक संतुष्टि रहती है।

जबरसिंह, राठौड़, शिक्षक

rajendra denok Reporting
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