scriptJain society is keeping principles of Mahavir relevant in Pali | महावीर के सिद्धांतों को प्रासंगिक बना रहा जैन समाज | Patrika News

महावीर के सिद्धांतों को प्रासंगिक बना रहा जैन समाज

-भगवान महावीर जन्म कल्याणक विशेष

पाली

Published: April 14, 2022 05:31:05 pm

पाली। भौतिक युग में भी भगवान महावीर के सिद्धांतों को प्रासंगिक बना रहा है पाली का जैन समाज। दान-पुण्य, धर्म-कर्म और समाजसेवा के साथ-साथ राजनीति के जरिए भी पाली जिले के जैन समाज ने अपनी अलग ही पहचान कायम की है। महावीर के सिद्धांतों को सही मायने में अंगीकार कर रहे यहां के जैन समाज की दानशीलता और समाजसेवा की प्रवृित्त देश-प्रदेश ही नहीं, दुनिया भर में ख्याती प्राप्त है। धर्म के लिहाज से राणकपुर का विश्व प्रसिद्ध मंदिर, तेरापंथ का तीर्थ स्थल सिरीयारी, घाणेराव का मुछाला महावीर, जैतारण का पावन धाम और पाली शहर का नवलखा मंदिर जैन इतिहास की विशालता का जीवंत प्रमाण है। जहां व्यापार और उद्योग में जैन समाज अग्रणी भूमिका निभा रहा है, वहीं, जीव दया का भाव भी यहां जैन समाज में कूट-कूट कर भरा है। यही कारण है कि समूचे पाली में महावीर के पद चिन्ह्ों पर चलने वाली अनुनायी बड़ी तादाद में है।
महावीर के सिद्धांतों को प्रासंगिक बना रहा जैन समाज
महावीर के सिद्धांतों को प्रासंगिक बना रहा जैन समाज
मानव जीवन के सच्चे प्रणेता महावीर : सुकन मुनि
भगवान महावीर मानव जीवन के सच्चे प्रणेता माने जाते हैं। सांसारिक जीवन की सफलता के लिए उनकी बताई हुई शिक्षा समस्त संसार की अहम आधारशिला है। कहने को भले ही भगवान महावीर जैनधर्म के तीर्थंकर थे, लेकिन सच्चे अर्थों में वे सम्पूर्ण सृष्टि को सत्य से साक्षात्कार सिखाने वाले महापुरुष थे। इसीलिए वे भगवान कहलाए। भगवान महावीर ने समस्त संसार के लोगों को समृद्ध एवं सफल जीवन और आत्मिक शांति की प्राप्ति के लिए जो राह बताई, उसका संसार में कोई विकल्प नहीं है।
प्रभु के क्षमा धर्म से विश्वशांति संभव - अमृत मुनि
तपस्वी रत्न उपप्रवर्तक अमृतमुनि ने बताया कि भगवान महावीर के अनमोल सिद्धान्तों से पूरे विश्व में शांति का साम्राज्य स्थापित किया जा सकता है। उनका क्षमा धर्म तो जगत विख्यात है। मनुष्य क्षमा धर्म को अपना लेता है तो परिवार ही नहीं, समाज, राष्ट्र और पूरे विश्व में शांति की लहर छा जाएगी। बढ़ते अत्याचार रुक जाएंगे। उन्होंने बताया कि प्रभु महावीर ने सम्पूर्ण मनुष्य जाति को एक है मानकर धर्म संघ में स्थान दिया और कहा कि मनुष्य जन्म से नहीं अपने कर्मों से महान बनता है। महावीर अहिंसा के दृढ़ उपासक थे, इसलिए किसी भी दिशा में विरोधी को क्षति पहुंचाने की वे कल्पना भी नहीं करते थे। वे किसी के प्रति कठोर वचन भी नहीं बोलते थे और जो उनका विरोध करता, उसको भी नम्रता और मधुरता से ही समझाते थे। आज महावीर के सिद्धांताें को अपनाने की जरूरत है।
महावीर का जीवन ही वास्तविक संदेश
आचार्य विजय जयानंद सूरि का कहना है कि सही मायने में देखा जाए प्रभु वीर के उपदेश या जीवन दर्शन तो हम लोग अपने-अपने अर्थों में देखते हैं, लेकिन असलियत में उनका जीवन ही उनका वास्तविक संदेश है। उनके आचरण, व्यवहार तथा वास्तविक जीवन में कोई अंतर नहीं था। वे जैसे थे, वैसे ही दिखते थे, जैसा बोलते थे वैसे ही रहते थे। उनके मन, बुद्धि, मस्तिष्क व आचरण तथा व्यवहार में एकरूपता थी। वे किसी से भेद नहीं करते थे।
पाली के नवलखा मंदिर में विराजमान पंन्यास प्रवर धैर्य सुंदर विजय व गणिवर्य निर्मोह सुंदर विजय का कहना है कि भगवान महावीर ने जीवन को समृद्ध बनाने, जीवन में आंतरिक शांति पाने के लिए जो सिद्धांत बताए वे बहुत प्रभावशाली है। चाहे वो अहिंसा हो, सत्य हो, अचौर्य हो, ब्रह्मचर्य हो या अपरिग्रह का सिद्धांत। वे हमारे जीवन को सुगम बनाने की शक्ति रखते हैं।
वीर प्रभु के सिद्धांत आज भी प्रासंगिक
गणिवर्य जयकीर्ति विजय के अनुसार वीर प्रभु के सिद्धांत आज भी प्रसांगिक है। अंहिसा विश्व को हर परिस्थिति में हिंसा से दूर रखता है। किसी का दिल दुखाना भी एक तरह की हिंसा है। अतः भूलकर भी किसी को कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए। दूसरा सिद्धांत सत्य, जो व्यक्ति सत्य के मार्ग पर चलता है, वह जीवन के कई कष्टों को पार कर जाता है। तीसरा सिद्धांत अचौर्य, यह जीवन का अनिवार्य अंग है। जिसका पालन करने वाला किसी भी रूप में अपने मन और इच्छा के मुताबिक वस्तु ग्रहण नहीं करते। इसलिए जीवन में हमेशा सन्तोषी, संयमित रहते हैं। जीवन में केवल वहीं वस्तु लेनी चाहिए जो सहजता से मिल जाए। दूसरों की वस्तुओं की चाह नहीं करनी चाहिए। चौथा सिद्धांत ब्रह्मचर्य। यह जीवन को पवित्रता से प्रतिपादित करता है।व्यक्ति को काम, आसक्ति के अधीन नहीं होना चाहिए। पांचवा और अंतिम सिद्धांत है परिग्रह। इस सिद्धांत से व्यक्ति की चेतना जागृत हो जाती है। इस सिद्धांत से संग्रह की प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है। जब संग्रहवृत्ति समाप्त हो जाती है तो हर हाल में व्यक्ति मस्त रहने लग जाता है।
विषम परििस्थतियों में कारगर
भगवान महावीर के उपदेश आज विषम परिस्थिति में बहुत कारगर है। ऐसी विषम परिस्थिति में भी इन सिद्धांतों को अपनाकर व्यक्ति अपना और दूसरों का जीवन आनन्दमयी बनाकर सहज जीवन जीकर प्रसन्न रह सकता है।
जैन सम्प्रदायों को एकता के सूत्र में पिरोता प्रभु महावीर जन्म कल्याणक
गेस्ट राइटर: उगमराज सांड, संस्थापक अध्यक्ष, जैन युवा संगठन, पाली
पाली। भगवान महावीर के सिद्धांत उनके जीवन काल के समय जितने प्रासंगिक थे, उतने ही आज है। पाली में महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव की शुरुआत आज से 42 साल पहले जैन युवा संगठन की स्थापना के साथ हुई थी। उस समय संरक्षक नेमीचंद कोचर थे और जैन युवा संगठन की स्थापना व महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव मनाने का विचार कर मूर्त रूप देने में व्यापारी वर्ग के जेठमल डागा, जसवंतराज सांड, दिनेश मेहता, चिरंजी गादिया, रमेश कोठारी, तुफानराज मेहता, पारसमल मेहता, महावीर मेहता व सरुेश संखलेचा ने की थी। इसका उदद्देश्य जैन धर्म के सभी सम्प्रदायों को एक जैनत्व के ध्वज के नीचे लाना था। सम्प्रदाय की भावना को भुलाना था। सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन करते हुए युवाओं का शारीरिक, मानसिक व बौदि्धक विकास करना था। इसकी कार्य स्थली बागबेरा दादावाड़ी को बनाया गया।
40-45 सदस्य थे प्रारम्भ में
जैन युवा संगठन की स्थापना के समय इसमें 40-45 सदस्य थे। आज इसमें 650 सदस्य हो चुके हैं और भविष्य में प्रत्येक जैन परिवार के एक सदस्य को इससे जोड़ने की योजना है। संगठन की ओर से ही कालान्तर में पर्यूषण के बाद संवत्सरी के बाद क्षमापना दिवस पर जैन स्नेह मिलन (जैन मेला) का आयोजन शुरू किया गया।
घी के दाम नौ लाख रुपए से बना था मंदिर तो कहलाया नवलखा
पाली। जैन समाज के पाली में सबसे पुराने मंदिरों में नवलखा पार्श्वनाथ भगवान मंदिर आता है। इस मंदिर का निर्माण आज से 1100 वर्ष पुराना माना जाता है। इसके बाद कई बार मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ और वर्तमान स्वरूप में मंदिर पहुंचा है। इस मंदिर का संचालन सेठ नवलचंद सुप्रतचंद जैन देवकी पेढ़ी की ओर से किया जाता है। इसके अलावा पेढ़ी की ओर से 15 मंदिरों का संचालन किया जाता है। यह पेढ़ी देश में इतने मंदिरों का संचालन करने वाली पेढ़ी में दूसरे नम्बर पर मानी जाती है।
पेढ़ी सचिव ओमप्रकाश छाजेड़ ने बताया कि संवत 969 में साण्डेराव में एक जिनालय के जीर्णोद्धार के बाद उसका प्रतिष्ठा महोत्सव चल रहा था। उस समय घी की आवश्यकता होने पर श्रावक आचार्य यशोभद्र सूरिश्वर के पास गए। आचार्य ने मंत्र शक्ति से पाली के व्यापारी के गोदाम में रखा घी मंगवाकर उपयोग में ले लिया। जिसका व्यापारी को पता तक नहीं चला। इसके बाद श्रावक घी का दाम चुकाने के लिए उस व्यापारी के पास पाली आए और घी ले जाने की बात बताई। इस पर व्यापारी बोला, उसने प्रतिष्ठा के लिए घी नहीं बेचा तो श्रावकों ने उसे गोदाम की जांच करने को कहा। जब व्यापारी गोदाम में पहुंचा तो वहां बर्तन तो थे, लेकिन खाली। श्रावकों ने घी की कीमत पूछी तो व्यापारी ने नौ लाख रुपए बताई, लेकिन राशि मंदिर प्रतिष्ठा में खर्च होने का कहकर लेने से इनकार कर दिया। इस राशि से ही पाली में नवलखा मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर नौ लाख रुपए से बना तो इसका नाम नवलखा रखा गया।
मूल नायक थे भगवान महावीर
नवलखा मंदिर के मूल नायक पहले भगवान महावीर थे। जिसका प्रमाण मंदिर में स्थापित कई प्रतिमाओं पर संवत 1144, संवत 1178 व संवत 1201 के लेखों से होता है। संवत 1686 में हुए मंदिर के जीर्णोद्धार के समय भगवान महावीर स्वामी के स्थान पर पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा स्थापित होने का उल्लेख है। प्रतिमाजी पर विक्रम संवत 1686 का लेख उत्कीर्ण है। इससे पहले मंदिर का जीणोZद्धार विक्रम संवत 1144 में होने का उल्लेख है।
52 जिनालय है नवलखा मंदिर
नवलखा मंदिर में भगवान पार्श्वनाथ मंदिर के पीछे आज भी भगवान महावीर स्वामी का मंदिर है। यह मंदिर 52 जिनालय है। इसका अर्थ है कि मंदिर में मूल नायक भगवान के चारों तरफ 52 डेहरियां है। जिनमें भगवान की प्रतिमाएं स्थापित है। भारत में भगवान पार्श्वनाथ के 108 जिनालय प्रसिद्ध माने जाते है। इनमें पाली का नवलखा मंदिर भी शामिल है।
भगवान सोमनाथ व गौड़ी पार्श्वनाथ से सन्मुख
पाली। सोमनाथ मंदिर पर नवलखा मंदिर की ही तरह प्राचीन गौड़ी पार्श्वनाथ मंदिर स्थित है। इसका संचालन भी सेठ नवलचंद सुप्रतचंद जैन देवकी पेढ़ी की ओर से ही किया जाता है। अध्यक्ष गौतमचंद रातडि़या मेहता के अनुसार इस मंदिर का निर्माण राजा कुमारपाल ने करवाया था। उस समय गौड़ी पार्श्वनाथ भगवान व सोमनाथ महादेव एक-दूसरे के सन्मुख थे। कालान्तर में निर्माण कार्यों के कारण अब यह स्थिति नहीं रही है।
तीर्थ है पाली की धर्म धरा
राणकपुर जैन मंदिर : यह विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। जिसमें हजारों पर्यटक आते है। इस मंदिर का 1446 विक्रम संवत में शुरू हुआ। जो 50 वर्षों से अधिक समय तक चला। इसके निर्माण में करीब 99 लाख रुपए का खर्च आया था। मंदिर में चार कलात्मक प्रवेश द्वार हैं। मंदिर के मुख्य गृह में तीर्थंकर आदिनाथ की प्रतिमा है। करीब 72 इंच ऊंची प्रतिमाएं चार अलग दिशाओं की ओर उन्मुख हैं। इसी कारण इसे चतुर्मुख मंदिर कहा जाता है।
राता महावीरजी: हथुंडी राता महावीर मंदिर धार्मिक आस्था का केन्द्र है। यह मंदिर करीब 17 सौ साल पुराना बताया जाता है। मंदिर पहाडिय़ों के बीच स्थित है। चारों ओर हरियाली से आच्छादित इस मंदिर की नक्काशी देखते ही बनती है। मंदिर में विराजमान मूलनायक भगवान महावीर की मूर्ति ईंट-चूना-रेत से बनी हुई है। बताया जाता है कि इस मूर्ति का मुंह गजसिंह और पीठ शेर की है। मूर्ति का रंग लाल रंग का प्रतीत होता है इसलिए इसे राता महावीरजी कहते हैं।
पावन धाम जैतारण: जैतारण पावन धाम गुरु मिश्रीमल महाराज और लोक संत रूप मुनि महाराज का समाधि स्थल है। यह स्थल स्थानकवासी जैन सम्प्रदाय के लिए एक तीर्थ स्थल से कम नहीं है। इसे 1974 में इस जगह छात्रावास बनवाया गया था। 1984 में गुरु मिश्रीमल के देवलोकगमन के बाद यहां समाधि स्थल बनाया गया। यहां अस्पताल भी संचालित है। इसके बाद इसकी तीर्थ स्थल के रूप में पहचान बनी आज देश विदेश से लोग यहां आते है।
आचार्य भिक्षु स्थल सिरियारी: राणावास के निकट सिरियारी में आचार्य भिक्षु समाधि स्थल तेरापंथ धर्म संघ का एक तीर्थ स्थल है। यहां बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं हर वर्ष आकर आचार्य भिक्षु का गुणगान करते है। इस स्थल पर एक नदी भी प्रवाहित होती है। इसकी खोज गुरुदेव की आज्ञा से की गई थी। उसके बाद उसे विकसित किया और भव्य रूप प्रदान किया गया।
इन मंदिरों का संचालन करती है पेढ़ी
-नवलखा पार्श्वनाथ जैन तीर्थ, नवलखा रोड पाली
-सुपार्श्वनाथ जैन मंदिर, गुजराती कटला
-शांतिनाथ मंदिर, केरिया दरवाजा
-गौड़ी पार्श्वनाथ मंदिर, सोमनाथ
-केशरियाजी जैन मंदिर, मीरा मार्ग
-आदिनाथ भगवान मंदिर, गांधी मूर्ति
-मुनि सुव्रतस्वामी जैन मंदिर, नेहरू नगर
-जीरावला पार्श्वनाथ जैन मंदिर, मानपुरा भाखरी
-शंखेश्वर पार्श्वनाथ जैन मंदिर, विवेकानंद सर्किल
-सीमन्धर स्वामी जैन मंदिर, हाउसिंग बोर्ड
-जिन कुशल सूरी जैन तपागच्छ दादावाड़ी, कालुजी की बगेची
-आदिनाथ जैन मंदिर, मारवाड़ जंक्शन
-धर्मनाथ भगवान मंदिर, जाडन
-कुंथुनाथ स्वामी जैन मंदिर, रूपावास

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