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पटरी से उतरी जिंदगी : कोई कर रहा मजदूरी तो कोई फोल्डिंग कर पाल रहा परिवार

- कोरोना के लॉकडाउन से निजी स्कूल संचालकों व शिक्षकों की आर्थिक स्थिति बिगड़ी

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पाली

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Suresh Hemnani

Jul 11, 2021

पटरी से उतरी जिंदगी : कोई कर रहा मजदूरी तो कोई फोल्डिंग कर पाल रहा परिवार

पटरी से उतरी जिंदगी : कोई कर रहा मजदूरी तो कोई फोल्डिंग कर पाल रहा परिवार

-राजीव दवे
पाली। शिक्षक, जिनके हाथों में चॉक रहती है और वह बच्चों को सवालों के जवाब समझाते हुए उनके भविष्य का निर्माण करता है। निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले उन शिक्षकों के साथ स्कूल संचालकों की कोरोना के कहर ने कमर तोड़ दी है। जिन हाथों में चॉक होती थी, वे अब तगारी उठाकर मजदूरी करने को मजबूर है। फैक्ट्री में कपड़े समेट रहे हैं और मशीनरी की दुकानों पर बूस्टर ठीक कर रहे है। जो स्कूल संचालक अपनी संस्थाओं के शिक्षकों को हर माह पगार देते थे। वे भी डेढ़ साल में कोरोना की मार से आठ-दस हजार रुपए पगार लेने वाले बन गए हैं। वे अब इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि स्कूल खुले तो एक बार फिर परिवार की गाड़ी पटरी पर लौटे।

कमठे पर काम करना हो गया मजबूरी
एक निजी स्कूल में कम्प्यूटर शिक्षक के रूप में सेवा देने वाले हीरालाल का जीवन कोरोना ने पूरी तरह बदल दिया। वे कहते हैं पिछले साल लॉकडाउन लगने पर करीब तीन माह तक घर बैठा रहा। इसके बाद आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई तो कमठे पर जाना शुरू किया। स्कूल आज तक नहीं खुले है। इस कारण कमठे पर ही काम कर रहा हूं। इससे स्कूल के मुकाबले कम रुपए मिलते हैं, लेकिन जैसे-तैसे परिवार का खर्च तो चल ही जाता है।

पढ़ाता था गणित, अब कर रहा फोल्डिंग का काम
निजी स्कूल में दसवीं कक्षा तक के बच्चों को गणित पढ़ाने वाले लक्ष्मण भी पिछले साल से ही बेरोजगारी का दंश झेल रहे है। वे कहते हैं कि स्कूल से पगार नहीं मिलने पर फोल्डिंग करने फैक्ट्री जाने लगा। वह काम आता नहीं है। इस कारण पूरे दिन बाद भी मुश्किल से 250 से 300 रुपए तक मिलते हैं। जो स्कूल की तनख्वाह से काफी कम है, लेकिन कम से कम पत्नी व बच्ची का पेट भरने के साथ श्रमिक पिता को सहारा तो मिल रहा है।

पानी की बोतलें और कुरकुरे बेच रहा
प्रकाश कच्छवाह स्कूल संचालक है। कोरोना के बाद से ही स्कूल बंद है। स्कूल में फीस भी आना बंद हो गई। इसके बाद खुद कोविड पॉजिटिव हुए। आर्थिक हालात बिगड़े तो रामलीला मैदान में भाई के ली गई किराए की दुकान के बाहर चबुतरी पर पानी की बोतले व कुरकुरे बेचना शुरू किया। वे बताते हैं कि इससे परिवार का खर्च चल रहा है। यह काम नहीं करते तो आर्थिक स्थिति इससे भी बुरे हो जाती।

अभिभावकों से नहीं मांग सके फीस, अब संकट
स्कूल संचालक अयूब खान बताते हैं कि स्कूल तो अभी है। वहां एक अध्यापक को दैनिक कार्य के लिए बुलाता हूं, लेकिन कोरोना के कारण अभिभावकों ने पिछले लम्बे समय से फीस नहीं दी है। इससे आर्थिक तकलीफ हुई तो मशीनरी की दुकान पर नौकरी शुरू कर दी। मशीन ठीक करने व पाइप आदि लगाने का कार्य आता था। इस कारण इस कार्य से अब संकट के समय परिवार की गाड़ी चला पा रहा हूं। स्कूल नहीं खुलने तक तो यह काम करना ही होगा।