टिप्पणी : सटीक रणनीति की विजय, पढ़ें पूरी खबर

नगर निकाय चुनाव 2019 : Nagar Nikay Chunav 2019 :

By: Suresh Hemnani

Published: 27 Nov 2019, 01:40 PM IST

-राजेन्द्रसिंह देणोक
पाली। नगर परिषद चुनाव में भाजपा ने टिकटों के वितरण से लेकर बोर्ड बनाने तक जिस तरह से एकजुटता और प्रबंधन का बेहतर उदाहरण दिया वही उसकी जीत का मूल मंत्र रहा है। पाली में जादुई आंकड़े से चार कदम दूर रही भाजपा सभापति के चुनाव में समीकरण साधने में सफल रही। सुमेरपुर पर लगातार चौथी बार कब्जा जमाना भी अथम परिश्रम का नतीजा है। इसे भाजपा की सटीक रणनीति ही कहा जाएगा जिसके सामने कांग्रेस न केवल चारों खानें चित्त हुई, बल्कि सभापति चुनाव में ‘चमत्कार’ होने जैसी आशंकाएं को भी निर्मूल साबित कर दिया।

कांग्रेस ने एक और परीक्षा में खराब प्रदर्शन कर यह साबित कर दिया कि पाली-सुमेरपुर की पंचायती में सफल होने के लिए उसे अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है। कांग्रेस नेताओं को सोचना पड़ेगा कि प्रदेश की सत्ता का लाभ उठाने में कहां चूक हुई? यह भी चिंता और चिंतन करना पड़ेगा कि पाली में 59 साल तक शहरी सरकार चलाने वाली पार्टी की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है। निकाय चुनाव का बिगुल बजने से पहले ही भाजपा नेता और कार्यकर्ता टीम वर्क से तैयारी में जुट गए थे।

पाली में स्थानीय विधायक ज्ञानचंद पारख और सुमेरपुर में विधायक जोराराम पूरे चुनाव में मजबूत किरदार रहे। टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार, सभापति उम्मीदवार चयन और बोर्ड के गठन तक में वल्गाएं उन्ही के हाथ में रहीं। गिने-चुने टिकटों को छोडकऱ शायद ही कोई ऐसा प्रत्याशी हो जो पारख और कुमावत की बिना रजामंदी उतारा गया। ऐसा भी नहीं है कि पार्टी में उनके विरोधियों की कोई कमी है। इसके बावजूद पार्टी नेताओं ने उन्हें ही कमान संभलाई। विधायक पारख के विरोधी भी भलि-भांति जानते हैं कि पाली में फिलवक्त पार्टी और विपक्ष में उनका विकल्प नहीं है। नतीजतन, जिस तरह से पार्टी ने खुद के 29 पार्षदों के अलावा 8 अन्य पार्षदों का समर्थन जुटाया, एक सफल रणनीति का ही हिस्सा माना जाएगा। दूसरी ओर, कांग्रेस की स्थिति सांप-नेवले जैसी रही।

नेताओं की आपसी कटूता ने ही पार्टी को रसातल में पहुंचा दिया। टिकटों के वितरण में भी कांग्रेस में खुलकर धड़ेबंदी हुई। कई काम चलाऊ प्रत्याशियों को मैदान में उतारा गया। प्रदेश में सत्तासीन पार्टी के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या होगी कि पाली में एक चौथाई प्रत्याशी तो तीसरे और चौथे नंबर पर रहे। सभापति पद का प्रत्याशी तय करने में पार्टी नेताओं ने जिस तरह से लॉबिंग की, कांग्रेस के लिए दुखदाई ही कहा जाएगा।

एकजुट होकर प्रयास करने की बजाय एनवक्त पर पूर्व सभापति प्रदीप हिंगड़ से करिश्माई उम्मीद रखना भी पार्टी के लिए घातक साबित हुआ है। कांग्रेस नेताओं ने नामांकन में एकजुटता का अभिनय जरूर किया, लेकिन एक-दूसरे को पटखनी देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यदि ऐसा नहीं होता तो कांग्रेस को इतनी फजीहत नहीं झेलनी पड़ती। सभापति के चुनाव में उलटफेर की भी पूरी आशंका थी, लेकिन भाजपा पार्षदों ने भरोसा कायम रखा। यह सियासत के लिए अच्छा संकेत माना जाएगा।

Suresh Hemnani
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