प्रथम विश्व युद्ध से जुड़ी है सुमेरपुर की यादें, कब्र-शिलालेख है गवाह

-पाली जिले के सुमेरपुर में अस्थाई जेल में कैदकर रखा था बंदियों को
-मौत के बाद 149 युद्धबंदियों को सुमेरपुर में ही दफनाया
-प्रत्येक युद्धबंदी की कब्र पर लगे हैं शिलालेख

By: Suresh Hemnani

Updated: 04 Mar 2021, 10:01 AM IST

- मोतीलाल सिद्धावत
पाली/सुमेरपुर। पाली जिले का सुमेरपुर जैसा छोटा शहर देश की आजादी से पहले पश्चिमी देशों के लिए एक महत्वपूर्ण गांव था। जर्मनी-इंगलैंड के बीच हुए युद्ध में बंदी बनाए गए तुर्की सैनिकों को सुमेरपुर में दफनाया गया था। जिनकी कब्रें आज भी सुमेरपुर में मौजूद हैं।

एतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार 4 अगस्त 1914 को जर्मनी व इंगलैंड के बीच युद्ध छिडऩे की सूचना मिलने पर तत्कालीन जोधपुर स्टेट के महाराजा सुमेरसिंह (जिनके नाम पर सुमेरपुर शहर बसा) एवं उनके अभिभावक सर प्रतापसिंह ब्रिटिश सरकार की सहायता के लिए तैयार हुए। युद्ध स्थल पर जाने के लिए जोधपुर रिसाले को साथ लेकर स्पेशल ट्रेनों से अगस्त 2014 को रवाना हुए। लंदन पहुंचने पर महाराजा सुमेरसिंह व सर प्रतापसिंह जार्ज पंचम से मिले। सम्राट ने नवयुवक महाराजा सुमेरसिंह की वीरता व उत्साह से प्रसन्न होकर 15 अक्टूबर 2014 को ब्रिटिश भारत की सेना का ऑनरेरी लैफ्टीनेंट नियुक्त किया।

तुर्की युद्धबंदियों को सुमेरपुर लाकर रखा गया
जर्मनी-इंगलैंड युद्ध में तुर्की ने जर्मनी का साथ दिया। इसलिए इस युद्ध में सैकड़ों तुर्की सैनिकों को बंदी बनाकर जोधपुर भेजा गया। जहा सैंट्रल जेल में रखा गया। कुछ दिनों तक वहां रखने के बाद सुमेरपुर भेजने की योजना पर विचार किया गया। सुमेरपुर में जहां कैदकर रखा जाना था। वहां के निवासियों को 1 लाख 57 हजार 76 रुपए हर्जाना देकर सुमेरपुर के पुराने स्थान पर बसाया गया। जिसे आज भी उंदरी कहा जाता है। सुमेरपुर बसने से पूर्व यहां उंदरी गांव आबाद था।

आज भी मौजूद हैं तुर्की कैदियों की कब्रें
सभी तुर्की युद्ध बंदियों को सुमेरपुर लाकर एक अस्थाई जेल में रखा गया। इस दौरान कुछ कैदियों की मौत हो गई। धीरे-धीरे सभी कैदी मौत का शिकार हो गए। कैदियों के मरने के बाद दफनाया गया। कैदियों की कब्रों के चारों ओर चारदीवारी बनाई गई। प्रत्येक कैदी के शव के पास सैनिक का नाम, बटालियन का नाम व मृत्यु तिथि अंकित किए हुए पत्थर लगाए गए हैं। आस-पास झाडियां हो गई हैं, लेकिन कब्रें व शिलालेख स्पष्ट नजर आ रहे हैं। अधिकांश सैनिकों की मौत सितंबर 1918 को होने संबंधी शिलालेख लगे हैं। सुमेरपुर के इस स्थान पर कुल 149 युद्धबंदियों की कब्रें हैं।

जर्मन दूतावास के अधिकारियों के संरक्षण में हैं कब्रें
सुमेरपुर में जहां कब्रें हैं। वहां पहले खुले भूखण्ड में कब्रें थी। बाद में सरकार ने उसके चारो ओर पक्की चारदीवारी का निर्माण करवाकर चारों ओर गेट लगाए गए। इस बारे में जर्मन दूतावास के अधिकारी भी पूरी जानकारी लेते रहते हैं। एक बार नई दिल्ली से जर्मन दूतावास के अधिकारियों का दल भी आया था।

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