scriptMobile addiction is pushing children on wrong paths 10101 | हे भगवान! किस राह पर जा रहे ये बच्चे...सिर्फ मोबाइल के लिए उठा लिया यह कदम...जानकर चौंक जाएंगे आप भी | Patrika News

हे भगवान! किस राह पर जा रहे ये बच्चे...सिर्फ मोबाइल के लिए उठा लिया यह कदम...जानकर चौंक जाएंगे आप भी

बच्चों की लत से आ रहे चौंकाने वाले दुष्परिणाम, रिश्तों पर चोट, अभिभावकों के सामने खड़ी हुई परेशानी, नहीं सूझ रहा रास्ता

पाली

Updated: December 24, 2021 12:50:15 pm

राजेन्द्रसिंह देणोक @ पाली. मोबाइल और सोशल मीडिया दोनों ही समय की जरूरत है। इसके कई उपयोग है। वह चाहे ऑनलाइन शिक्षा हो या कौशलवृद्धि और संवाद। Mobile और Internet ने युवाओं को सहूलियत दी है। कोविडकाल में उन्होंने घर बैठकर ही Online Education पूरा किया। लेकिन जिस गति से इसके दुष्परिणाम (Child Mobile Addiction) सामने आ रहे हैं, चिंता लाजिमी है। खासतौर से युवा पीढ़ी में एंड्रॉयड और Social media की लत हैरान-परेशान करने वाली है। मोबाइल का दखल रिश्तों को चुनौती दे रहा हैं। बच्चे अपनों से ही बागी बन रहे हैं। कोई घर-छोडकऱ भाग रहा है तो किसी ने माता-पिता पर ही आक्षेप लगाने शुरू कर दिए। Child Welfare Committee and Juvenile Trust Board के सामने हाल के महीनों में चौंकाने वाले ऐसे कई प्रकरण सामने आए हैं।
हे भगवान! किस  राह पर पहुंच रहे ये बच्चे...सिर्फ मोबाइल के लिए उठा लिया यह कदम...जानकर चौंक जाएंगे आप भी
हे भगवान! किस राह पर पहुंच रहे ये बच्चे...सिर्फ मोबाइल के लिए उठा लिया यह कदम...जानकर चौंक जाएंगे आप भी
बाल कल्याण समिति और किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष अब तक लावारिश, गुमशुदा, पीडि़त, प्रताडि़त और बाल अपचारी जैसे बच्चे आते रहे हैं। लेकिन कोविड के बाद अब ऐसे प्रकरण नियमित सामने आ रहे हैं जिसके पीछे मोबाइल एक बड़ा कारण है। ऐसे बच्चों की काउंसलिंग के लिए अभिभावक बाल कल्याण समिति के समक्ष उम्मीद लेकर पहुंच रहे हैं। कुछ बच्चों को बाल सुधार गृह में रखा गया है। कइयों को काउंसलिंग के बाद घर भेजा गया है।

उदाहरण : बच्चों पर मंडराते खतरों की बानगी
केस-1
14 साल की बेटी दिनभर एंड्रॉयड पर व्यस्त रहती है। फोन पर घंटों बात करती है। उसका व्यवहार पूरी तरह बदल गया। टोकते पर नाराज हो जाती है। घर में किसी से ज्यादा बात नहीं करती, दिनभर मोबाइल में ही खोई रहती है। कुछ कहो तो आक्षेप लगाती है कि मारपीट करते हैं। अब कह रही है उनके साथ नहीं रहना चाहती। बेटी के इस व्यवहार से परेशान पाली शहर के एक दंपत्ति ने बाल कल्याण समिति के समक्ष अपनी यह व्यथा बताई।
केस-2
एक सप्ताह पूर्व गुजपरात के वापी शहर का एक बालक रानी स्टेशन पर मिला। उसे ऑनलाइन गेम की ऐसी लत लगी हुई थी कि वह घर से भाग निकला। स्कूल में उसने एक पत्र छोड़ा। पत्र में लिखा था कि माता-पिता, भैया, दीदी मुझे गेम नहीं खेलने देते हैं। इसलिए वह पर्स से एक हजार रुपए लेकर घर छोडकऱ जा रहा है। वापी से गायब हुए बालक को बाल कल्याण समिति ने परिजनों को सुपुर्द किया।
केस-3
एक 15 पन्द्रह वर्षीय बालिका ने बाल कल्याण समिति में रिश्तेदार द्वारा उसके साथ मारपीट करने की शिकायत की। समिति ने पड़ताल शुरू की। सामने आया कि बालिका माता-पिता का कहना नहीं मानती। दिनभर मोबाइल पर चेटिंग और कॉलिंग में लगी रहती है। बालिका की काउंसलिंग में यह भी खुलासा हुआ कि वह यौन शोषण का शिकार है। उसने कई लोगों पर ब्लैकमेलिंग के आरोप लगाए। समिति ने बालिका को बालिका गृह में आश्रय दिया है।
केस-4
शहर के ही एक व्यक्ति ने बाल कल्याण समिति में लिखित में शिकायत दी कि उनकी 14 साल की बेटी का व्यवहार बदल गया है। वह घर में किसी से भी घुल मिलकर नहीं रहती। वह मोबाइल पर घंटों बात करती है। कई बार घर से बिना बताए बाहर चली जाती है और देर रात तक नहीं लौटती। पिता की रिपोर्ट पर बाल कल्याण समिति ने बालिका को संरक्षण में लेकर बालिका गृह में रखा है।

काउंसलिंग के लिए आ रहे अभिभावक
मोबाइल और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग घातक साबित हो रहा है। ऑनलाइन क्लास और पढ़ाई के नाम पर बच्चों को फोन उपलब्ध कराना अभिभावकों के लिए जरूरी बन गया, लेकिन इसके कई दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। अभिभावकों को सामने दोहरी चुनौती है। मोबाइल के उपयोग व बच्चों पर ध्यान रखना होगा। बच्चों को पर्याप्त समय देने की भी आवश्यकता है। बच्चों के व्यवहार में बदलाव आए अथवा कहना नहीं माने तो Bal kalyan samiti व child helpline (1098) की भी मदद ली जा सकती है। बाल कल्याण समिति बच्चों की काउंसलिंग करेगी और उन्हें सही राह दिखाने का प्रयास करेगी।
सीताराम शर्मा, अध्यक्ष, बाल कल्याण समिति, पाली

बच्चों में बढ़ रहा मनोविकार
मोबाइल की लत से बच्चों में मनोविकार भी बढ़ गए हैं। कई ऐसे केस सामने आए हैं जिसमें बच्चा मोबाइल न मिलने पर अपने माता-पिता से मारपीट करता हैं। अभद्र भाषा का उपयोग करता है। ऐसे दो-तीन केस प्रतिदिन आते हैं। बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है। अभिभावक बच्चों पर निगरानी रखें और उन्हें पूरा समय दें, तभी इस परेशानी से बचा जा सकेगा।
डॉ. दलजीतसिंह राणावत, मनोचिकित्सक, बांगड़ अस्पताल, पाली

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