पाली में भी दबा हुआ है तूतीकोरिन सा गुस्सा..

गुस्से की चिंगारी से पाली में भी सुलग सकता है प्रदूषण का बारूद

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Published: 24 May 2018, 05:28 PM IST

-तमिलनाडु में कॉपर प्लांट के विरोध के बीच यहां कभी भी भडक़ सकती है सीने में दबी आक्रोश की चिंगारी

पाली . तमिलनाडु में कॉपर प्लान्ट से फैलने वाले प्रदूषण को लेकर सौ दिन बाद वहां के निवासी आक्रोशित हो उठे हैं। कमोबेश ऐसे ही हालात पाली में भी पैदा हो सकते हैं। वहां प्रदूषण का जनक तूतीकोरिन स्थित स्टरलाइट कॉपर प्लांट को माना जा रहा है, जबकि यहां तो प्रदूषण की जद में ना सिर्फ पाली, बल्कि आस-पास के सैंकड़ों गांव आ चुके हैं। हालत यह है कि प्रदूषण की समस्या का सरकारी और प्रशासनिक स्तर पर निदान का दावा तो किया जा रहा है, लेकिन धरातल पर काम नहीं हो पा रहा है। ऐसे में हजारों लोगों के सीने में दबी आक्रोश की चिंगारी यहां कभी भी प्रदूषण के बारूद को भडक़ा सकती है। यह स्थिति तो तब है, जबकि नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) समेत अन्य अदालतें पाली के प्रदूषण को लेकर गंभीरता दिखा चुकी हैं। करीब साढ़े नौ सौ कपड़ा कारखानों वाले इस शहर की पहचान कपड़ा उद्योग ही है। इन इकाइयों में कपड़े की रंगाई-छपाई का काम बहुतायत में होता है। प्रदूषण की समस्या नई नहीं है, सालों से है। लेकिन, जैसे-जैसे उद्योगों में नवाचार के साथ मशीनीकरण हुआ, समस्या में इजाफा होता गया।

कुओं का पानी हो चुका खराब

रोहट क्षेत्र के दर्जनों गांवों के हजारों किसान अपनी उपजाऊ जमीन के साथ कुओं का पानी विषैला होने का खामियाजा भुगत रहे हैं। करीब तीस सालों से इन किसानों को समस्या के निदान का आश्वासन तो मिलता रहा है, लेकिन समाधान नहीं। अब आलम यह है कि किसान पर्यावरण संघर्ष समिति के बैनर तले प्रभावित किसान एनजीटी की शरण ले चुके हैं, लेकिन वहां तारीख पर तारीख ही मिल रही है। लगभग तीस सालों से किसान इलाके में स्थित कपड़ा कारखानों से फैल रहे प्रदूषण के खिलाफ लड़ रहे है। कपड़ा कारखानों से निश्रावित रंगीन पानी से बांडी नदी ही नहीं, पाली से 50 किलोमीटर आगे तक के कुओं का पानी प्रभावित हो चुका है। पानी में घातक पदार्थ भारी मात्रा में पाए जा चुके हैं। किसान जानते हैं कि इस इलाके का भूजल कपड़ा कारखानों से प्रदूषित हो रहा है और इलाके की एकमात्र मौसमी नदी बांडी इसके कारण बर्बादी की कगार पर पहुंच गई है।

पहली सीईटीपी हमें मिली

पाली देश का पहला औद्योगिक शहर है, जहां सीईटीपी की स्थापना की गई थी। आज यहां छह प्लांट स्थापित हैं, फिर भी प्रदूषण का स्तर बढ़ता ही जा रहा है। कपड़ा उद्योग की तकनीक में कोई नया बदलाव आता है तो प्रदूषण निस्तारण की तकनीक में भी बदलाव आना ही चाहिए, लेकिन सीईटीपी ने बदलते ज़माने के साथ खुद को नहीं बदला। अब उसके विभिन्न प्लांट प्रदूषित पानी के बदलते स्वरूप को पहचानने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं।

सीएसई के नतीजे चौंकाने वाले

कुछ सालों पहले सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायन्मेंट ने प्रदूषण मापक लेबोरेट्री में भूजल और इलाके में पाए जाने वाले विभिन्न औद्योगिक प्रदूषकों की जांच की तो यहां के पानी में क्रोमियम, लेड, निकल, जिंक और आर्सेनिक की भारी मात्रा पाई गई। यह घातक प्रदूषण जितने स्तर का पाया गया, उसके कारण स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं मसलन त्वचा कैंसर, दिमागी और दिल सम्बन्धी बीमारियां, फेफड़ों के संक्रमण की सम्भावना बढ़ जाती है।

2006 के बाद बढ़ा गुस्सा

कुछ कारखाना संचालक जलशोधन संयंत्रों की नजर से बचाकर भी कचरा जल नदी में बहा रहे हैं। समय के साथ बाजार की जरूरतों में बदलाव आया है और उसके अनुसार पाली के उद्योगों ने भी करवट ली है। पहले सूती कपड़े की मांग थी और इसी हिसाब से औद्योगिक इकाइयां लगी थीं। बाद में सिंथेटिक कपड़ों का चलन आ गया और कपड़ा रंगने वाली इकाइयों में तेजाब आधारित प्रक्रिया अपनाई जाने लगी। प्रदूषण के निपटारे के लिए लगाए गए संयंत्र पुराने ढर्रे के थे और वे औद्योगिक बदलाव के साथ कदम मिलाने में विफल रहे। प्रदूषण पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। ऐसे में किसानों के साथ शहरी क्षेत्र के बाशिन्दों के सीने में प्रदूषण के खिलाफ पनप रहा गुस्सा यहां भी बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।

 

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