इनके खून से होता था मारवाड़ के राजा का राजतिलक, राजतंत्र का मोह छोड़ कूदे आजादी की लड़ाई में

इनके खून से होता था मारवाड़ के राजा का राजतिलक, राजतंत्र का मोह छोड़ कूदे आजादी की लड़ाई में

Rajendra Singh Denok | Publish: Aug, 13 2019 05:35:33 PM (IST) Pali, Pali, Rajasthan, India

आजादी के दीवाने-2

Rajendra singh Denok

पाली. बगड़ी नगर.मारवाड़ रियासत में जब भी नए राजा का राजतिलक होता था, बगड़ी के ठिकानेदार खून से तिलक करते थे। रियासतकाल में यह ओहदा एकमात्र बगड़ी ठिकाने को ही प्राप्त था। आऊवा ठाकुर कुशालसिंह चांपावत की अगुवाई में 1857 में जब आजादी की चिंगारी फूटी तो बगड़ी ठिकाना भी अग्रणी भूमिका में आ गया। आऊवा पर हमला करने जा रही अंग्रेज सेना को सहयोग देने से साफ इनकार कर दिया। सन् 1857 में हुए स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति में मारवाड़ की देशी रियासतों व ठिकानों का बड़ा योगदान रहा है। इतिहास साक्षी है कि जब आऊवा के ठाकुर खुशाल सिंह ने राजपुताने में 1857 की क्रांति का बिगुल बजा तब आसपास के ठिकानों में भी फिरंगीयों के विरूद्ध लडऩे का जज्बा जाग उठा। स्वतंत्रता के इस संग्राम में जोधपुर रियासत के टिकायत का दर्जा प्राप्त बगड़ी ठिकाना के तत्कालीन ठाकुर ने भी इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा दिया। बगड़ी ठाकुर के क्रांतिकारी कदम से अंगे्रज बोखला व ठिकाने को जब्त करवाया। बात उन दिनों कि है जब अंगे्रज सेनापति जी. एस. पी. लॉरेंस आऊवा से ब्यावर जा रहा था तो रास्ते में बगड़ी के ठिकानेदार मानसिंह से राशन और ठहरने की सुविधा मांगी। देशभक्ती के ज्वार में डूबे बगड़ी ठाकुर ने गढ के दरवाजे बंद करवा लिए तथा लारेन्स और उसकी सेना को राशन व आवास सुविधा देने से इंकार कर दिया।


जब्त हो गया था ठिकाना
बगड़ी ठिकानेदार द्वारा सहयोग नहीं मिला तो अंग्रेज अफसर लॉरेंस ने जोधपुर राजा को पत्र लिखा और ठिकाना जब्त करा दिया। यहां तक की बगड़ी के कई अधिकार भी छीन लिए गए। 1857 की क्रांति से पूर्व बगड़ी ठिकाना भी मारवाड़ रियासत में काफी प्रभावशाली था। मजिस्ट्रेटी पावर के साथ-साथ ठिकाने की अपनी पुलिस होती थी। 84 गांव अधीन थे। ठिकाने का राजस्व भी काफी अधिक था।

ऐसे मिला सिला
आऊवा के खिलाफ लड़ाई में अंग्रेज सेना का साथ नहीं देने पर बगड़ी ठिकाने के कई अधिकारी छीन लिए थे। यहां तक की ठिकाने का पट्टा भी जब्त कर लिया। इस क्रांति से पहले बगड़ी को विशेष दर्जा प्राप्त था। शासक को गद्दी पर बिठाने और सर्वप्रथम तलवार भेंट करने का अधिकार भी बगड़ी को ही था।
भवानीसिंह, पूर्व जागीरदार(तत्कालीन ठिकानेदार शिवनाथसिंह की छठी पीढ़ी)

नई पीढ़ी को पढ़ाया जाए इतिहास
1857 की क्रांति में बगड़ी की भी भूमिका रही। इतिहास इसका साक्षी है। सरकार को ऐसे स्वर्णिम इतिहास को सहेजना चाहिए। वर्तमान और भावी पीढ़ी इससे रूबरू हो इसके लिए पाठ्य पुस्तकों में शामिल किया जाना चाहिए। सरकार को अपने स्तर इतिहास संरक्षण के प्रयासों की आवश्यकता है।
राजेन्द्र पोकरना, सहमंत्री, तेरापंथ सभा, बगड़ी नगर

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