कोरोना असर : उपचार नहीं मिला तो फेफड़ों में जमी धूल ने रोक दी सांस

-कोरोना महामारी के कारण तीन माह तक नहीं लगा सिलिकोसिस शिविर
-जिले में करीब 10 सिलकोसिस मरीजों की चली गई जान

By: Suresh Hemnani

Updated: 24 Aug 2020, 01:27 PM IST

पाली। लाइलाज बीमारी सिलकोसिस [ Silcosis disease ] से पीडि़त लोगों के लिए कोरोना महामारी [ Corona epidemic ] ‘काळ’ बनकर आई। उनको कोरोना वायरस [ Corona virus ] ने तो नहीं जकड़ा, लेकिन घरों में कैद रहने के कारण फेफड़ों में जमी धूल ने उनकी सांसे रोक दी। जिससे जिले में करीब 10 मरीजों की धडकऩ बंद हो गई। इसका पता लगने पर पाली के चिकित्सकों ने तीन माह बाद मंगलवार को बांगड़ चिकित्सालय [ Bangar Hospital ] में शिविर [ Silicosis camp ] लगाकर अब मरीजों को राहत दी है।

बांगड़ चिकित्सालय में कोरोना के कारण जनवरी व फरवरी के बाद 18 मार्च को अंतिम सिलिकोसिस शिविर लगाया गया था। इसके बाद शिविर को बंद कर दिया गया। ऐसे में इस बीमारी से ग्रसित 639 लोगों में से कुछ की जान पर बन आई। इन मरीजों को लॉकडाउन व उसके बाद शिविर लगाने पर पाबंदी होने के कारण समय पर ऑक्सीजन व उपचार नहीं मिला। नतीजा यह निकला की करीब 10 मरीजों ने दम तोड़ दिया। दूसरी तरफ मरीजों के सर्टिफिकेट भी नहीं बने है।

अभी भी कम पहुंच रहे मरीज
बांगड़ चिकित्सालय में सिलिकोसिस के मरीजों को उपचार के लिए बुलाना शुरू किया गया है, लेकिन उनकी संख्या कम ही है। अभी लगाए जाने वाले शिविर के लिए मरीज को इ-मित्र से पंजीयन कराना होता है। इसके बाद चिकित्सालय से चयनित मरीजों को फोन कर बुलाया जाता है। जिले के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले कई मरीजों को इसकी जानकारी नहीं होने से वे शिविर में नहीं पहुंच रहे हैं।

ऑक्सीजन लगाना जरूरी
खदानों व पत्थर की तुड़वाई का कार्य करने वालों की सांसों के साथ धूल के कण शरीर में जाकर फेफड़ों में जमा हो जाते है। फेफड़ों के एल्यूलाई (लाखों में होती है संख्या) में जहां हवा भरी होती है। वहां धूल जम जाती है। इससे फेफड़े काम करना बंद कर देते है और सांस लेने में तकलीफ होती है। इस स्थिति में मरीज को ऑक्सीजन दिया जाना जरूरी होता है। जो कोरोना काल में नहीं हो सका। इसके अलावा अन्य फेफड़े की तकलीफ के कारण मरीजों को जान से हाथ धोना पड़ा।

अब तक 59 की मौत
जिले में वर्ष 2016 से लेकर अब तक 59 सिलिकोसिस मरीजों की जान जा चुकी है। इनमें वर्ष 2016 व 2017 में एक-एक, 2018 में 12, 2019 में 36 मरीजों की जान गई थी। इस साल कोरोना में उपचार नहीं मिलने और बीमारी बढऩे से करीब दस जने काळ का ग्रास बन चुके हैं।

फोन करके बुला रहे मरीजों को
सिलिकोसिस के मरीजों को कोरोना काल में शिविर नहीं लगने से बुलाया नहीं गया था। अब हम फोन करके हर मंगलवार को मरीज बुलाकर जांच कर रहे हैं। सर्टीफिकेट जारी करने की भी कार्रवाई कर रहे हैं। इससे मरीजों को राहत मिली है। -डॉ. ललित शर्मा, प्रभारी, सिलिकोसिस, बांगड़ चिकित्सालय, पाली

Suresh Hemnani
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