VIDEO....ये लोग ऐसे है जो कड़वा खाकर दूसरों के घरों में मिठास घोलते हैं

‘मिठास घोलने वाले’ घरों में नमक खरीदने जितना ही आ पाता है पैसा

- गन्ने के उत्पादक किसानों की व्यथा

- किसानों को दिन की दिहाड़ी के बराबर भी नहीं मिल रही मजदूरी

By: Rajeev

Updated: 29 Mar 2019, 09:37 PM IST

- चन्द्रशेखर अग्रवाल . फालना .

गोडवाड़ व मेवाड़ क्षेत्र में गन्ने के उत्पादक किसान खेत में गन्ने की फसल उगाते है। इसके बाद गुड़ बनाते है, लेकिन जी तोड़ मेहनत कर लोगों के घरों में मिठास घोलने वाले इन किसानों के घर में नमक खरीदने जितने पैसे ही आते हैं। इसका बड़ा कारण सरकार की ओर से गन्ने का समर्थन मूल्य तय नहीं करना और कोई योजना नहीं होना है।

अरावली की वादियों में रहने वाले किसान विषम परिस्थितियों में गन्ना उत्पादन करते हैं। क्षेत्र में गन्ना पैदा होने के बाद किसान गन्ने का रस निकालकर खेत में ही घास-फूस व पत्तों को इक_ा कर कड़ाही में गुड़ बनाते हैं। गन्ना उत्पादक किसान को इस फसल के रोपण से लेकर गुड़ निकालने का हिसाब लगाया जाए तो प्रतिदिन 50 रुपए की मजदूरी भी नहीं मिल रही है। समस्या ये भी है कि किसान छोटे-छोटे खेतों में गन्ने की फसल उगाते हैं। फसल के बड़े होने पर उसमें रस आने पर फसल को काट कर खरीददारों के अभाव में उनके पास गुड़ बनाने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं रहता है।
लगते हैं पांच से छह घंटे

गुड़ के एक घाण को पकाने के लिए करीब 5 से 6 घंटों का समय लगता है। जिसमें दो श्रमिक लगते हैं। जो दूध को मावा बनाने की तरह घोट-घोट कर गन्ने के रस को आग पर पकाकर देशी मेवाड़ का गुड़ बनाते हैं। इस गुड़ के लिए कहा जाता हैं कि इसकी तासीर अच्छी होती है, लेकिन इसका रंग काला होता है। जिसका कारण इसको बनाने की पूरी पद्धति प्राचीन कालीन पद्धति पर आधारित होना है।

प्रति किलो 25 से 30 रुपए मिलते हैं
गुड़ तैयार होने पर किसान घर-घर जाकर 25 से 30 रुपए किलो के भाव से बेचते हैं। जो फसल लागत व गुड़ निर्माण की राशि के बराबर भी नहीं है। इसी कारण यहां के युवा अब नए कार्य तलाश रहे हैं। कई लोग गंवों से दूर शहरों में जाकर नौकरी करने को मजबूर है।

ध्यान देना चाहिए
गन्ना उत्पादक किसान पूरी मेहनत करता है, लेकिन उसे दिन की दिहाड़ी के बराबर भी किसी प्रकार का प्रतिफल नहीं मिलता है। सरकार को गन्ना किसानों की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।

वालकी देवी गमेती, पूर्व सरपंच, सिंघाड़ा पंचायत

महीने के मिलते दो हजार

गन्ना उत्पादन से लेकर गुड़ बनाने व बाजार में बेचने तक महीने के दो हजार भी नहीं मिलते हैं। पुश्तैनी धंधा है, इसलिए करते हैं।
नाथूराम गमेती, गन्ना मजदूर, जोरमा -सायरा

Rajeev Reporting
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