VIDEO : यहां चंग की थाप व फागुन के लोकगीतों से होता है 1857 के महान वीरों का गुणगान

Suresh Hemnani

Publish: Mar, 20 2019 01:18:34 PM (IST) | Updated: Mar, 20 2019 01:18:35 PM (IST)

Pali, Pali, Rajasthan, India

पाली/आउवा। रंगों के त्योहार होली जो राजस्थान की लोक संस्कृति में अपना विशेष महत्व रखती है। होली रंगों का त्यौहार नहीं बल्की इसका ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व भी है। होली का त्यौहार लोगों को आपस में जोडऩे के साथ ही उनके प्राचीन गौरवशाली इतिहास से भी अवगत करवाता है। कुछ ऐसी ही होली का त्यौहार देखने को मिलता है पाली जिले के ऐतिहासिक आउवा गांव में। आउवा की क्रांति वैसे तो स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है और इसका इतिहास भी राजस्थान की क्रांति में विशेष महत्व रखता है, लेकिन फागुन के त्यौहार इस गांव में उत्साह व उमंग के साथ मनाया जाता है।

यहां के लोकगीत आज भी राजस्थान के साथ देश के विभिन्न हिस्सों में आउवा का नाम फागुन के गीतों में गाया जाता है। पाली जिले के आउवा गांव में होली का खूंटा स्थापित होने के साथ ही चंग की थाम पर 1857 के महान वीरों का फागुन के लोकगीतों के माध्यम से गुणगान किया जाता है। नई पीढ़ी को इन लोकगीतों के महत्व व स्वतंत्रता संग्राम की जानकारी भी मिलती है। आज भी फागुन के त्यौहार में आउवा के लोक गीत देश में अपना स्थान बनाए हुए हैं। इन गीतों में सुगाली माता का भी गुणगान किया जाता है। रूपसिंह सिसोदिया द्वारा कुण्डल सरोवर की तीर पर आज भी पूरी मण्डली द्वारा रात्रि के समय फागुन के गीतों का गायन किया जाता है। ऐसे ही फागुन के गीत गाकर वीरों को याद किया जाता है। इसमें कवी साहित्यकार इंद्रसिंह सिसोदिया, ठाकुर पुष्पेन्द्र सिंह आउवा, रूपसिंह सिसोदिया, कवी सुखसिंह राजपुरोहित, रमेश दवे, भैरूसिंह राजावत, मनोहरलाल सोनी, सुखाराम माली सहित अन्य समाजों को सहयोग रहता है।

देश में गूंजता है आउवा का नाम
फागुन के गीतों में पूरे देश में आउवा का नाम अमर है। आज भी राजस्थान सहित देश के विभिन्न हिस्सों में आउवा के गीत सुनाई देते हैं, यही नहीं आउवा का फागुन में जो लोकगीत गाये जाते हैं वो वीरों को समर्पित होते हैं।

आज भी ग्रामीण निभा रहे परम्परा
आउवा में होली के दौरान प्रत्येक समाज की गेर किले में जाकर नृत्य करती है। इसके साथ ही लोकगीतों के साथ आउवा के इतिहास का ग्रामीणों द्वारा बखान भी किया जाता है। इस दौरान राजघराने द्वारा सभी का आदर-सत्कार भी किया जाता है। सदियों से यही परम्परा गांव में चली आ रही है।

चंग की थाप पर थिरकते है गेरिये
चंग की थाप के साथ ही फागुन के महीने की शुरुआत की जाती है। इसके साथ ही आउवा के गौरवशाली इतिहास को लोकगीतों के माध्यम से पूरी रात बैठकर चंग की थाप के साथ गाया जाता है।

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