VIDEO : पाली के टेक्सटाइल उद्योग पर लगा कलंक मिटाने के लिए एक उद्यमी ने उठाया ये कदम,जानिए पूरी खबर...

Suresh Hemnani

Publish: May, 10 2019 01:30:56 PM (IST) | Updated: May, 10 2019 02:32:54 PM (IST)

Pali, Pali, Rajasthan, India

-पाली के टेक्सटाइल उद्योग में 48 केएलडी का एमवीआर प्लांट लगाने की कवायद
-राजस्थान में भाप पर आधारित पहला प्लांट पाली में लगेगा

-राजेन्द्रसिंह देणोक
पाली। टेक्सटाइल इण्डस्ट्री के प्रदूषण से जूझ रहे पाली, जोधपुर और बाड़मेर जैसे कई शहरों में अब प्रदूषण की समस्या भाप की तरह उड़ सकेगी। यह संभव हो सकेगा एमवीआर तकनीक से। प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए चंडीगढ़ की एमवीआर (मैकेनिकल वेपर रीकंप्रेसिंग) तकनीक का पहला पहला पायलट प्रोजेक्ट पाली में जल्द ही शुरू किया जा रहा है। परिणाम आशानुरूप रहे तो पाली ही नहीं समूचे राजस्थान के टेक्सटाइल उद्योग को संजीवनी मिलेगी।

यह तकनीक अमरीकन टेक्नोलॉजी पर आधारित है। देश के कई शहरों में इसके प्लांट संचालित है, लेकिन राजस्थान में ये पहला प्रोजेक्ट पाली में ही शुरू हो रहा है। दुबई में समुद्र का खारा पानी भी इसी तकनीक से पीने योग्य बनाकर सप्लाई किया जा रहा है। पूणे में गुड़ प्लांट, गोहावटी में पेपर प्लांट और गुडग़ांव में सिटी सिवरेज का पानी भी एमवीआर तकनीक से ट्रीट किया जा रहा है।

यूं समझिए तकनीक
-फैक्ट्रियों के रासायनिक पानी को प्लांट में भरकर 65 डिग्री तापमान तक गर्म किया जाएगा। गर्म होने के बाद पानी भाप बनकर उडऩे लगेगा। भाप के रूप में उडऩे वाले पानी को प्लांट में ऊपरी सतह पर लगे पंखे तेजी से नीचे गिराएंगे। पानी गर्म प्लेट्स पर गिरेगा। स्लज सतह में जमा हो जाएगी और भाप के रूप में साफ हुआ पानी पुन: काम में लिया जा सकेगा।
-इस तकनीक की सबसे खास बात यह भी है कि रासायनिक पानी को साफ करने में किसी तरह का कैमिकल उपयोग में नहीं लिया जाएगा। यानि प्लांट बिजली से संचालित होंगे और भाप के रूप में पानी को साफ करेंगे।

यूं समझें पैसों की गणित
-सीइटीपी में प्रतिदिन 80 लाख लीटर पानी ट्रीट किया जाता है। इस पर करीब 6 लाख रुपए खर्च होते हैं।
-यही पानी यदि जेडएलडी तकनीक से साफ किया जाए तो प्रतिदिन 18 लाख रुपए खर्च होंगे।
-एमवीआर तकनीक से मात्र 4 लाख रुपए का खर्च ही आएगा। कपड़ा फैक्ट्रियों में 4 लाख रुपए तो पानी पर ही खर्च करने पड़ते हैं। पानी के रीयूज से पानी का खर्च पूरा बचेगा।

पहले था 9500 टीडीएस, साफ किया तो सिर्फ 16 टीडीएस
अमूमन कपड़ा फैक्ट्रियों से निकलने वाले पानी में 9500 टीडीएस रहता है। ये पानी जब लुधियाना के प्लांट में साफ किया गया तो उसका टीडीएस 16 ही आया। पानी का रंग भी साफ-सुथरा और गंध भी गायब थी। जब अहमदाबाद की लेबोरेट्री से आई इस पानी की रिपोर्ट आई तो इस तकनीक पर विश्वास और बढ़ गया। प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अधिकतम मापदंडों से भी काफी कम मानक पाए गए।

कपड़ा उद्योग के लिए संजीवनी
यहां के कपड़ा उद्यमियों को ऐसी तकनीक का लम्बे समय से इंतजार था। पाली के भविष्य के लिए अब मैं पहल करने जा रहा हूं। मेरा विश्वास है कि ये तकनीक पाली के लिए संजीवनी साबित होगी। मेरा पायलट प्रोजेक्ट सफल रहा तो अन्य फैक्ट्रियों और सीइटीपी में भी लागू करेंगे। इससे प्रदूषण और पानी की समस्या खत्म होगी। -कमलेश गुगलिया, उपाध्यक्ष सीइटीपी

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