इन 222 लोगों को हर पल रहता है मौत का डर!

इन 222 लोगों को हर पल रहता है मौत का डर!

Suresh Kumar Mishra | Publish: Feb, 09 2016 11:19:00 PM (IST) Panna, Madhya Pradesh, India

सिलिकोसिस की जांच की सुविधा जिला अस्पताल में नहीं, जिला प्रशासन सिलिकोसिस पीडि़त मरीजों का इलाज कराने के बजाए मुआवजा बांटने के लिए कर रहा मौत का इंतजार, मलेशिया से ट्रेनिंग लेकर आए डॉक्टर के तबादले के बाद भगवान भरोसे पीडि़त


पन्ना
जिले में सिलिकोसिस बीमारी से पीडि़त 222 लोग जीवन की हर सांस के साथ मौत का इंतजार कर डर में जी रहे हैं। जिला प्रशासन पीडि़तों का समुचित इलाज करने के बजाए उनके मरने का इंतजार कर हा है, ताकि उनके परिवारों को मुआवजा देकर अपने कर्तव्यों से इतिश्री कर ले। जिला प्रशासन की ओर से चिह्नित 17 मजदूरों में से 5 और पत्थर खदान मजदूर संघ द्वारा हालैंड के डॉक्टर मुरली से कराई गई जांच में चिह्नित  222 मरीजों में से अब तक 12 लोगों की मौत हरे चुकी है और जो जिंदा हैं वे सीने में दर्द की असहनीय पीड़ से तड़प-तड़प कर हर पल मौत के भय में जी रहे रहे हैं।

जिले में करीब 124 पत्थर खदानें हैं। वर्तमान में इनमें से अधिकांश पत्थर खदानें पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं मिलने के कारण बंद हैं। इन खदानों में जिलेभर के हजारों की संख्या में लोग काम करते थे। पत्थर खदानों में काम करने वाले मजदूर इसकी डस्ट के
सांस के साथ फेफड़ोंं में पहुंचने से सिलिकोसिस बीमारी से पीडि़त हुए हैं।

पत्थर खदान मजदूर संघ के अध्यक्ष यूसुफ बेग ने बताया, हालैंड के डॉक्टर मुरली के जिले के पत्थर मजदूरों की जांच कराई थी। पहले वर्ष 2011 और फिर 2013 में लगे शिविरों में से कुल 222 मजदूर सिलिकोसिस पीडि़त पाए गए। सरकार ने इन्हें सिलिकोसिस पीडि़त मानने से इंकार करते हुए स्वयं शिविर लगाने के लिए कहा था। बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज सागर के डॉक्टरों ने महज 20 मरीजों की जांच की थी जिसमें 17 लोगों को सिलिकोसिस पीडि़त का प्रमाण-पत्र दिया गया। उन्होंने बताया कि प्रदेश शासन के निर्देश है कि जिला अस्पताल में प्रत्येक बुधवार को शिविर लगाकर सिलिकोसिस पीडि़तों की जांच व इलाज किया जाए।

पत्थर की तरह हो जाते हैं फेफड़े

पत्थर खदानों में मजदूरी करने वालो लोगों के सांस लेने पर पत्थर की धूल संास के साथ जाकर फेफड़ों में जमा होने लगती है। इससे धीरे-धीरे इनके फेफड़े पत्थर की तरह ठोस होने लगते हैं। इससे इन्हें संास लेने में भारी तकलीफ होती है। सीने में असहनीय दर्द होता है और
सांस लेने में परेशानी होती है। इससे लोगों का वजन कम हो जाता है और अंतत: उनकी मौत हो जाती है।

प्रशिक्षित डॉक्टर का कर दिया तबादला
जिले में सिलिकोसिल पीडि़तों की बढ़ती संख्या को लेकर जिला अस्पताल के डॉक्टर सुधाकर पांडेय को मलेशिया भेजकर प्रशिक्षित किया गया था, लेकिन कुछ ही समय बाद उनका तबादला कर दिया गया था। इसके बाद से जिला अस्पताल में सिलिकोसिस पीडि़तों के इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। जिला प्रशासन ने भी उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया है।

यहां जांच की सुविधा तक नहीं
जिले में इतनी बड़ी संख्या में सिलिकोसिस पीडि़त होने के बाद भी जिला अस्पताल में इसके जांच तक की व्यवस्था नहीं है। जिला अस्पताल पहुंचने पर सिलिकोसिस पीडि़त मरीजों को भी टीवी के मरीजों की तरह इलाज किया जाता है। यही गलत इलाज उन्हें और मौत के मुंह में ढकेल देता है।

एक और ने दम तोड़ा
जिले के सिलिकोसिस पीडि़त एक और मरीज श्यामू लूनिया पिता जुगल लूनिया निवासी रामगंज वार्ड क्रमांक 5 पन्ना की बीती रात 49 साल की आयु में मौत हो गई। श्यामू के पास तीन बेटे हैं। बताया गया कि वह महज 9 साल  की उम्र से पत्थर खदानों में मजदूरी करने लगा था। शासन की ओर से जिन 17 लोगों को सिलिकोसिस पीडि़त का प्रमाण-पत्र जारी किया गया था उनमें श्यामू भी शामिल था।

चिह्नित 17 में अब तक 5 की मौत

जिला स्वास्थ्य विभाग की ओर से पूर्व में लगाए गए जांच शिविर में 20 लोगों की जांच की गई थी। 17 लोगों को सिलिकोसिस पीडि़त पाया गया था। इनमें से 5 लोगों की अब तक मौत हो चुकी है। जिनमें शेख सहाबुद्धीन (60), बालकिशन आदिवासी निवासी बढौर(42), आशाराम आदिवासी निवासी माझा (38), रमजान खान निवासी आगरा मोहल्ला (50) शामिल हैं। इन्हें शासन की ओर से 3-3 लाख रुपए की मुआवजा राशि का वितरण भी किया जा चुका है।

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