पुरी जैसी जगन्नाथ यात्रा पन्ना में, 166 साल से राजसी भव्यता

पुरी जैसी जगन्नाथ यात्रा पन्ना में, 166 साल से राजसी भव्यता

suresh mishra | Publish: Jul, 14 2018 11:42:18 AM (IST) Panna, Madhya Pradesh, India

जगत के दर्शन को रथ पर सवार होकर आ रहे भगवान जगन्नाथ, शाही अंदाज में रवाना होगी सवारी, आज लखूरन बाग में रात्रि विश्राम, भगवान जगन्नाथ की धूप-कपूर झांकी के दर्शन को उमड़े श्रद्धालु

पन्ना। चंद घंटों के बाद ऐतिहासिक जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव का मुख्य समारोह शुरू होने वाला है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा शनिवार को गाजे-बाजे के साथ निकाली जाएगी। रथयात्रा भगवान जगन्नाथ मंदिर से गॉर्ड ऑफ ऑनर से शाम को शुरू होगी। पहला पड़ाव लखूरन बाग में होगा। भगवान बलभद्र, बहन सुभद्रा के साथ यही रात्रि विश्राम करेंगे। शाम को भगवान रथ में सवार होकर भाई-बहन के साथ जनकपुर के लिए प्रस्थान करेंगे।

इससे पहले साल में एक बार चंद मिनटों के लिए सजने वाली भगवान की धूप-कपूर झांकी के दर्शन को शुक्रवार को शहर उमड़ पड़ा। रथयात्रा में 8 से 10 हजार श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। गौरतलब है कि इस साल भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का 166वां वर्ष है। शनिवार शाम पुलिस जवान भगवान को गॉर्ड ऑफ ऑनर दिए जाने के बाद पूर्व राजपरिवार के लोग भगवान को चंवर डुलाकर रथ खींचकर यात्रा का शुभारंभ करेंगे।

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रियासत की सेना होती थी शामिल
बताया गया, राजशाही के समय रथयात्रा भी शाही अंदाज में निकालती थी। पन्ना रियासत की सेना के हाथी, घुड़सवार और पैदल सैनिक यात्रा में शामिल हुआ करते थे। तब रथयात्रा का जलवा ही अलग था। जगन्नाथपुरी के बाद देश की दूसरी रथयात्रा पन्ना में निकाली जाती थी। पूरे प्रदेश से लोग रथयात्रा देखने यहां पहुंचते थे। हालात यह होती थी कि शहर के सभी सार्वजनिक स्थल, सराय आदि में लोगों को रुकने के लिए जगह नहीं मिलती थी।

70 से 80 हजार श्रद्धालु आते थे

राजपरिवार की ओर से श्रद्धालुओं के रात में रुकने और भोजन आदि की व्यवस्था की जाती थी। धीरे-धीरे प्रदेश के अन्य स्थानों में यात्रा की शुरुआत होने से पन्ना के प्रति लोगों का आकर्षण कम होने लगा। अब तो हाल यह है कि जिले में ही कई जगह रथयात्रा निकाली जाने लगी है। इससे श्रद्धालुओं की संख्या और भव्यता में कमी आई है। बताया जाता है कि पहले रथयात्रा महोत्सव में प्रदेश से 70 से 80 हजार श्रद्धालु आते थे।

बुंदेली संस्कृति में ढल गई रथयात्रा
रथयात्रा महोत्सव को बुंदेली संस्कृति के हिसाब से ढाला गया है। मंदिर से जुड़े लोग बताते हैं कि जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव स्नानयात्रा के साथ शुरू होता है। इस दौरान लू लगने से भगवान १५ दिन बीमार पड़ जाते हैं। बीमारी से उठने के बाद भगवान को कच्चे भोजन का प्रसाद लगाया जाता है। भगवान भोजन में अचार की मांग करते हैं, लेकिन लक्ष्मीजी यह कहकर अचार नहीं देती हैं कि अभी आप बीमारी से उठे हो नुकसान करेगा। इससे भगवान देवी लक्ष्मी से रुष्ट हो जाते हैं और भाई बलभद्र एवं बहन सुभद्रा के साथ ससुराल जनकपुर के लिए निकल पड़ते हैं। वहां पहुंचने के बाद उनका टीका किया जाता है। दूसरे दिन पूजा-अर्चना के बाद उन्हें मंदिर में प्रवेश करा दिया जाता है। यहां वे दो दिन तक रुके रहते हैं।

देवी लक्ष्मी को मनाने का प्रयास

इधर भगवान के वापस नहीं लौटने पर देवी लक्ष्मी विचलित होने लगती हैं और भगवान को मनाने के लिए खुद जनकपुर जाने का निर्णय लेती हैं। वे वहां पहुंचकर भगवान को मनाती हैं, लेकिन उनके नहीं मानने के कारण उनके हाथ बांध लौट जाती हैं। लक्ष्मीजी के रुठकर जाने के बाद भगवान चिंतित हो जाते हैं और जनकपुर से लौटने लगते हैं। वहां वे मंदिर पहुंच देवी लक्ष्मी को मनाने का प्रयास करते हैं। देवी के नहीं मानने पर उन्हें गहने देकर मनाते हैं और कहते हैं कि हम आपके लिए गहने लेने गए थे। लक्ष्मी के मानने के बाद भी भगवान को रात मंदिर के बाहर ही बितानी पड़ती है। सुबह पूजा-अर्चना के बाद भगवान मंदिर में प्रवेश करते हैं। यहां सात झांकियों के दर्शन के साथ ही महोत्सव का विधिवत समापन हो जाता है।

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बैंडपार्टी की कहानी भी अलबेली
महाराज बैंड के लोग बीते कई दशक से इसमें बैंड बजा रहे हैं। बताया गया कि महोत्सव के दौरान बजाई जाने वाली धुन अन्य बैंड पार्टी के लोग नहीं बजा पाते। प्रमुख बात यह है कि बैंड पार्टी में ज्यादातर सदस्य मुस्लिम परिवारों के हैं। इससे यहां गंगा-जमुनी तहजीब भी देखने को मिलती है। इस धार्मिक आयोजन का हिस्सा बनने के लिए बैंड पार्टी के लोग सालभर का इंतजारकरते हैं।

जनकपुर का मेला है अलबेला
रथयात्रा महोत्सव मंदिर के दौरान भगवान के जनकपुर पहुंचने के साथ ही यहां मेला शुरू हो जाता है। सात दिन तक चलने वाले इस मेले का आयोजन ग्राम पंचायत की ओर से किया जाता है। इस अवसर पर भंडारे का भी कार्यक्रम होता है। इसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं। मेला में लगने वाले झूले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र होते हैं। मेले में ही आसपास के 50 गांवों के लोग आते हैं।

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जब से देखा तभी से निकल रही रथयात्रा
मंदिर के पुजारी राकेश गोस्वामी ने बताया कि हमने जब से देखा तब से रथयात्रा निकल रही है। उन्होंने बताया, तत्कालीन पन्ना महाराज किशोर सिंह भगवान के विग्रह को रथ में सजाकर जगन्नापुरी से चार माह तक पैदल यात्रा करके पन्ना लाए थे। यहां उन्होंने पहले से ही मंदिर निर्माण के निर्देश दे दिए थे, जब तक वे भगवान को लेकर पन्ना पहुंचे तब तक राजमहल के अंदर ही भव्य मंदिर बनकर तैयार था। जहां संवत 1874 को वैदिक मंत्रोच्चार के साथ तीनों प्रतिमाओं के विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। इसके बाद गोस्वामी परिवार के लोग ही पीढिय़ों से मंदिर की सेवा करते आ रहे हैं। उन्होंने बताया, मंदिर में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा के करीब 36 साल बाद महाराज किशोर सिंह के समय रथयात्रा महोत्सव का शुभारंभ हुआ।

सालभर में सजने वाली प्रमुख झांकियां
धूप कपूर की झांकी: यह झांकी भगवान की रथयात्रा के दौरान सजाई जाती है। स्नान यात्रा के दौरान 15 दिन की बीमारी से उठने के बाद भगवान काफी कमजोर हो जाते हैं। भगवान के कच्चे भोजन का भोग लगाने के बाद दूसरे दिन आषाढ़ माह की परीवा को भगवान की धूप और कपूर की आरती की जाती है। भगवान की झांकी के दर्शन श्रद्धालुओं को पतली जाली से होते हैं। यह झांकी साल में एक ही बार सजती है।

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मंदिर में 26 मढिय़ां
मंदिर की खासियत: भगवान जगन्नाथ स्वामी मंदिर पन्ना शहर के प्राचीनतम मंदिरों में से है। इसके शिखर पर स्वर्ण कलश स्थापित है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर सिंहों की दो प्रतिमाएं हैं। मंदिर के चारों ओर 26 छोटे मंदिर (मढिय़ां) बने हैं, जिनका निर्माण पन्ना रियासत के तत्कालीन जागीरदारों ने कराया था।

काष्ठ की मूर्ति : तत्कालीन पन्ना नरेश महाराजा किशोर सिंह जगन्नाथ स्वामी मंदिर में विराजमान जगन्नाथ स्वामी, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के विग्रह को उडि़सा महाराज से प्राप्त कर चार माह में पन्ना लाए थे। प्रतिमाएं काष्ठ निर्मित हैं। यहां संवत 1874 में विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा कराई गई थी।

दूसरी प्राचीन रथ यात्रा : पुजारी राकेश गोस्वामी बताते हैं कि पन्ना की जगन्नाथ स्वामी रथयात्रा पुरी के बाद देश की दूसरी सबसे प्राचीन रथयात्रा है। वर्ष 1995 में यहां रथयात्रा महोत्सव में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने पांच कैबिनेट मंत्रियों के साथ शामिल हुए थे।

सखी वेश की झांकी: भगवान जगन्नाथ स्वामी के सखी वेश की झांकी फागुन माह की तीज को सजाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन राधाजी ने भगवान श्रीकृष्ण को सखी के वेश में सजाकर सखियों के साथ होली खेली थी। मंदिर में की यह झांकी साल में एकबार ही सजती है।

- बलदेव स्वरूप की झांकी: भगवान की यह झांकी हलषष्टी पर्व पर सजाई जाती है। इस दिन शेषावतार भगवान बलदेव का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

- श्रीकृष्ण स्वरूप की झांकी: यह झांकी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर सजाई जाती है। भगवान जगन्नाथ की झांकी को श्रीकृष्ण की झांकी के रूप में सजाया जाता है।

- 7 मूर्तियों के दर्शन: भगवान की यह झांकी रथयात्रा महोत्सव के अंतिम दिन दिखाई देती है। रथयात्रा के समापन के बाद जब भगवान मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते हैं तब वहां एकसाथ सात मूर्तियों के दर्शन होते हैं।

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