बजाज और बिड़ला ने मिलकर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को कैसे बचाया?

बजाज और बिड़ला ने मिलकर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को कैसे बचाया?

Gyanesh Upadhyay | Publish: Dec, 01 2018 07:35:36 PM (IST) Patna, Patna, Bihar, India

गांधी जी के निर्देश पर सेठ बजाज ने बचाई डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के परिवार की इज्जत और उनका पुश्तैनी मकान

पटना। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की जन्मस्थली जीरादेई, बिहार में स्थित पुश्तैनी मकान आज अगर शान से खड़ा है, तो इसमें बजाज और बिड़ला जैसे सेठों का बड़ा हाथ है। विशेष रूप से जमनालाल बजाज का योगदान सर्वाधिक है और वे कभी महीनों तक जीरादेई में रहे थे।
दरअसल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के बड़े भाई महेन्द्र प्रसाद ही जीरादेई में जमींदारी का काम देखते थे। बड़े भाई ने राजेन्द्र प्रसाद को हमेशा आजादी दी कि वे निश्चिंत होकर देश सेवा कर सकें। भाई की मृत्यु हुई, तो पता चला कि परिवार पर बहुत ज्यादा कर्ज है। सेठ जमनालाल बजाज (1889-1942) ने भी डॉॅ. राजेन्द्र प्रसाद के बोलने पर कर्ज दे रखा था, यह कर्ज प्रसाद परिवार ने छपरा में चावल मिल लगाने के लिए लिया था। छपरा में बिजली उत्पादन कंपनी लगाने के लिए भी कर्ज लिया गया था। चावल मिल ठीक से नहीं चल पाई, कर्जा ज्यादा हो गया।

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मकान बिकने से बचा लिया
प्रसाद परिवार पर बजाज और अनेक साहूकारों का कर्ज इतना था कि पूरी जमींदारी और पुश्तैनी मकान बिक जाने की नौबत आ गई थी। कर्ज मुक्ति के लिए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इसके लिए भी तैयार थे। कांग्रेस के काम पर वे ध्यान नहीं दे पा रहे थे, ऐसे में, महात्मा गांधी ने ऋण मुक्ति के अभियान के लिए सेठ बजाज को जीरादेई भेजा, ताकि राजेन्द्र प्रसाद को वापस कांग्रेस के काम में लगाया जा सके।
गांधी जी के आदेश पर सेठ बजाज काम में लग गए, कर्ज अधिक था, इसलिए उन्होंने सेठ घनश्यामदास बिड़ला (1894-1983) से भी मदद मांगी। तमाम साहूकारों के कर्ज चुकता हो गए। सेठ बजाज ने पुश्तैनी मकान को बचा लिया, प्रसाद परिवार की इज्जत भी बच गई।

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बजाज का बड़प्पन
दूसरों के पैसे तो चुका दिए गए थे, लेकिन बजाज और बिड़ला के पैसे लौटने की गुंजाइश नहीं बन रही थी, बची हुई कुछ जमींदारी कोई खरीदने को तैयार नहीं था, तो सेठ बजाज ने यह काम किया, लेकिन जमींदारी को राजेन्द्र बाबू के छोटे बेटे धनंजय प्रसाद के नाम से ही लिख दिया। योजना यह थी कि बची हुई जमीन से धीरे-धीरे कर्ज और मूल अदा हो जाएगा। सेठ बजाज को राजेन्द्र बाबू अपना बड़ा भाई मानते थे और महात्मा गांधी ने तो सेठ बजाज को एक तरह से गोद ही ले रखा था। सेठ जमनालाल बजाज ने ही वर्ष 1926 में बजाज समूह की नींव रखी थी।

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