' ठीके तो है नितीश कुमार ' पोस्टर से बिहार में सियासी गरमाहट

' ठीके तो है नितीश कुमार ' पोस्टर से बिहार में सियासी गरमाहट
' ठीके तो है नितीश कुमार ' पोस्टर से बिहार में सियासी गरमाहट

Brijesh Singh | Updated: 02 Sep 2019, 08:49:00 PM (IST) Patna, Patna, Bihar, India

Nitish Poster: पिछले विधानसभा चुनाव के नारे 'बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है' की जगह इस बार ' क्यू करें विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार ' के पोस्टरों ने बढ़ाई सियासी गरमी।

( पटना, प्रियरंजन भारती ) । तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके नितीश कुमार ( Nitish Kumar ) एक बार फिर से राज्य में अपनी सत्ता कायम रखने को आतुर हैं। पिछली बार तो उनके रणनीतिकार प्रशांत किशोर ( Prashant Kishore ) ने जदयू+राजद+कांग्रेस का गठबंधन करवा कर समीकरणों को मजबूत करते हुए नितीश कुमार की सरकार बनवा दी थी, लेकिन माना जा रहा है कि इस बार प्रशांत किशोर से नितीश के रिश्ते कुछ उलझ से गए हैं। ऐसे में एक पोस्टर इन दिनों बेहद चर्चा में हैं, जिसमें छाप तो प्रशांत किशोर की नजर आ रही है, लेकिन कहा जा रहा है कि यह पोस्टर प्रशांत किशोर की सलाह पर नहीं लगाया गया है। दरअसल, पिछली बार विधानसभा चुनाव के लिए प्रशांत किशोर ने लाइन दी थी 'बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है।' जबकि इस बार पटना में जो पोस्टर ( Poster Of Nitish ) लगे हैं, उन पर लिखा है ' क्यू करें विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार।'

पोस्टर-बैनर से फिर गरमाई राजनीति

दरअसल, नीतीश कुमार के समर्थन में लगे इन पोस्टरों से ही राजनीति भी गरमा गई है। कहा जा रहा है कि लगातार बिहार की राजनीति करते आ रहे नितीश कुमार को लेकर स्थानीय स्तर पर अब यह आवाज भी उठने लगी है कि नितीश कुमार को अब राष्ट्रीय राजनीति में भी हाथ आजमाना चाहिए। राज्य सरकार में सहयोगी भाजपा भी अपने लिए इसी में रास्ता देख रही है। भाजपा नेताओं का मानना है कि जब तक नितीश कुमार हैं, तब तक बिहार में भाजपा ( Bjp In Bihar ) के लिए वैकल्पिक रूप से किसी नेता को आगे कर पाना संभव नहीं होगा, लेकिन जैसे ही नितीश राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखते हैं, वैसे ही भाजपा स्थानीय स्तर पर नेतृत्व को आगे करने के साथ ही सत्ता में बड़े भाई की भूमिका में आ सकती है, जो फिलहाल छोटे भाई की भूमिका में है।

लोकसभा में साफ हो गया था राजद गठबंधन

काबिलेगौर है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा और जदयू ने मिलकर आरजेडी ( RJD ) और उनके कांग्रेस, रालोसपा, हम जैसे सहयोगियों का सूपड़ा ही साफ कर दिया था। आलम यह रहा कि लालू की पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। हालांकि चुनाव जीतने के बाद केंद्र सरकार में मंत्री पदों के आवंटन को लेकर जदयू और भाजपा में तनातनी हो गई। नतीजा यह हुआ कि जदयू केंद्र सरकार में शामिल नहीं हुई। बदले में कुछ ही घंटो के भीतर राज्य में जब नितीश ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया, तो उसमें भाजपा के सदस्यों को शामिल नहीं किया। उसके बाद से दोनों दलों के बीच रिश्तों में तनाव को लेकर खबरें आती रही हैं। तीन तलाक और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 ( JDU On 370 ) हटाए जाने के मुद्दे पर भी जेडीयू मोदी सरकार के साथ नहीं रहा। हाल ही में एनआरसी मुद्दे पर भी जेडीयू ने अलग रुख अपनाया। अब ऐसे में नितीश के समर्थन में लगे पोस्टरों और उनकी भाषा से कई तरह के सियासी संकेत निकल रहे हैं, जिसे समझने की राजनीतिक विश्लेषक भी कोशिशें कर रहे हैं।

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