इलेक्शन 2019 स्पेशल...तीसरे चरण में राजनीतिक दलों के बीच बाजी झटकने की होड़

इलेक्शन 2019 स्पेशल...तीसरे चरण में राजनीतिक दलों के बीच बाजी झटकने की होड़

Prateek Saini | Publish: Apr, 22 2019 07:54:15 PM (IST) Patna, Patna, Bihar, India

विशेष संवाददाता प्रियरंजन भारती की रिपोर्ट...

 

(पटना): तीसरे चरण में उत्तर बिहार की जिन पांच लोकसभा सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश पर सीधा मुकाबला है। बस शरद यादव की सीट मधेपुरा और पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन की सीट सुपौल में महागठबंधन की अंदरूनी लडा़ई चुनावी मुकाबले को बहुकोणीय और दिलचस्प बना रही है।

 

मधेपुरा

इस सीट से शरद यादव महागठबंधन के बड़े दल आरजेडी उम्मीदवार के नाते चुनाव के मुख्य आकर्षण हैं। इनका मुकाबला जदयू के दिनेश चंद्र यादव और जन अधिकार पार्टी के राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव से है। पप्पू यादव आरजेडी के यहां से निवर्तमान सांसद हैं और वह कांग्रेस या आरजेडी उम्मीदवार के बतौर चाहकर भी मैदान में नहीं उतर पाए। लालू यादव के नहीं चाहने से ही पप्पू पैदल हुए। हालांकि वह घर-घर जाकर वोट देने की कारगर अपील कर रहे और इसका असर भी हुआ। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शरद यादव से बाजी झटकने के मिशन को साधने के लिए दस दिनों से मधेपुरा में ही कैंप करते आ रहे हैं। उन्होंने यहां रहकर ही चुनाव अभियान चलाया और जदयू प्रत्याशी दिनेश चंद्र यादव समेत आसपास के क्षेत्रों में एनडीए प्रत्याशियों की जीत के लिए सशक्त अभियान चलाया। पप्पू यादव से लालू परिवार की खुन्नस उन्हें महागठबंधन उम्मीदवार बनने से रोक गई और अब वह हर हाल में शरद की लुटिया डुबोने पर तुले हैं।

 

सुपौल

मधेपुरा की जंग का असर सुपौल पर भी सीधा पड़ रहा है। यहां की निवर्तमान कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन फिर महागठबंधन उम्मीदवार बनकर मैदान में हैं। राहुल गांधी पक्ष में चुनावी रैली भी कर गए। पर महागठबंधन की किचकिच यहां रंजीत रंजन के गले का फांस बनी हुई है। लालू यादव और पप्पू यादव की लडा़ई का असर यहां मैदान में साफ दिख रहा है। यानी शरद-पप्पू की लड़ाई का रिटर्न गिफ्ट रंजीत रंजन को झेलना पड़ रहा है। आरजेडी के जिला महासचिव और पूर्व विधायक दिनेश प्रसाद यादव निर्दलीय मैदान में उतरकर कांग्रेस की हालत बिगाड़ने के खेल में जुटे हैं। इन्हें आरजेडी नेतृत्व का भरपूर समर्थन प्राप्त है। आरजेडी के जिलाध्यक्ष और विधायक यदुवंश यादव ने भी कांग्रेस के खिलाफ पूरी ताकत झोंक दी है। ऐसे में जदयू उम्मीदवार दिलेश्वर कामत को प्रत्यक्ष लाभ मिलता दिख रहा है। यानी महागठबंधन की आपसी खींचतान में दोनों ही सीटों मधेपुरा और सुपौल में एनडीए को बढ़त मिलने के स्पष्ट हालात बन गए दिखते हैं।

 

झंझारपुर

झंझारपुर बाढ़ से प्रभावित रहने वाला मिथिलांचल का अहम इलाका है। यहां इस बार भाजपा के वीरेंद्र चौधरी की बजाय जदयू के रामप्रीत मंडल मैदान में हैं और मुकाबले में आरजेडी के विधायक रहे गुलाब यादव महागठबंधन उम्मीदवार हैं। लड़ाई इन्हीं दो पाटों के बीच है। कुशवाहा, मैथिली ब्राम्हण और यादव बहुल इस क्षेत्र में कुशवाहा समाज के मतदाता उपेंद्र कुशवाहा के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बनाने की बात करते मिले। शंभुआड़ बाजार में और कन्हौली में राष्ट्रवाद की बातें करते हुए युवा वोटर यही कहते मिले कि दिल्ली की गद्दी पर जो बैठे हैं, उन्हें फिर से वहीं बैठा देना है। मतदाता बता रहे कि प्रत्याशी बेशक मजबूत न हो, पर उन्हें देश की रक्षा और सम्मान के लिए वोट करना है। जगन्नाथ मिश्र के क्षेत्र झंझारपुर में इस बार और कोई दूसरा मुद्दा है ही नहीं। लोग केवल देश के नाम पर वोट करने का जज्बा ज़ाहिर करते देखे गए। ऐसे में तय है कि लडा़ई आरपार की ठनी है और यहां भी कि फैसला राष्ट्रीयता के नाम पर ही होना है।

 

अररिया

इस सीट पर भाजपा का उम्मीदवार है और मुकाबले में महागठबंधन की ओर से आरजेडी उम्मीदवार है। अररिया से सांसद रहे तसलीमुद्दीन के निधन के बाद यहां हुए उपचुनाव में उनके पुत्र सरफराज अहमद दोबारा चुनकर आए। आरजेडी ने उन्हें फिर से मैदान में उतारा है। अररिया में हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण बड़ी ही आक्रामक तरीके से हुआ करता है। बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे की गर्माहट और और राष्ट्रवाद की धमक यहां गोलबंदी को आक्रामक बनाती है। ऐसे में आरपार की लड़ाई भाजपा के प्रदीप सिंह और आरजेडी के सरफराज के बीच ही ठनी है।

 

खगड़िया

खगड़िया में एनडीए का मुस्लिम उम्मीदवार महागठबंधन के आगे ताल ठोंक रहा। लोग दंग हैं कि जिस जमात के लोग कभी निर्णायक होते रहे उनकी भाषा भी बदली है। मुख्य संघर्ष यहां लोकजन शक्ति पार्टी के निवर्तमान सांसद और एनडीए उम्मीदवार चौधरी महमूद अली कैसर और महागठबंधन के उम्मीदवार विकासशील इंसान पार्टी के अध्यक्ष मुकेश साहनी के बीच है। साहनी पहली बार यहां से चुनाव में उतरे हैं। एनडीए उम्मीदवार कैसर आक्रामक तरीके से मुस्लिम मतदाताओं में अपनी पैठ बनाते नज़र आ रहे हैं। जातियों से ऊपर उठकर यहां भी देश बचाने का मुद्दा चुनाव को अलग रंग में रंग गया है।

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