थिएटर की रोशनी में ढूंढा अपना कॅरियर, इसी की बदोलत मिला बिस्मिल्ला अवॉर्ड

थिएटर की रोशनी में ढूंढा अपना कॅरियर, इसी की बदोलत मिला बिस्मिल्ला अवॉर्ड
थिएटर की रोशनी में ढूंढा अपना कॅरियर, इसी की बदोलत मिला बिस्मिल्ला अवॉर्ड

Anurag Trivedi | Publish: Sep, 17 2019 01:50:59 PM (IST) पत्रिका प्लस

पत्रिका प्लस की स्पेशल इंटरव्यू सीरीज 'मंडे मोटिवेशन' में रूबरू हुए लाइट डिजाइनर और रंगकर्मी गगन मिश्रा, गगन ने कहा, बैक स्टेज में भी पहचान बनाई जा सकती है, इसके लिए खुद में विश्वास जगाना बेहद जरूरी

जयपुर. अक्सर लोग फिल्म और टीवी में बड़े-बड़े लोगों को एक्टिंग करते हुए देख थिएटर या अन्य माध्यमों से जुड़ते हैं और फिर बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने का सपने देखते हैं। जयपुर के रंगकर्मी गगन मिश्रा भी एक्टिंग के आकर्षण के चलते थिएटर से जुड़े, लेकिन बाद में बैक स्टेज में लाइट डिजाइन में अपनी क्रिएटिविटी से देशभर में पहचान बनाई और आज इसमें कॅरियर बनाने के बाद देश के प्रतिष्ठित पुरस्कार उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अवॉर्ड भी मिल चुका है। पत्रिका प्लस की मंडे मोटिवेशन सीरीज के तहत गगन मिश्रा ने बात करते कहा कि 'मेरे पिता चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं और उनका व परिवार का नाम रोशन करूं। हालांकि मेरी रूचि पढ़ाई की तरफ कम थी, ऐसे में मैंने दोस्त की सलाह पर ११वीं कक्षा से बंक मारकर रवीन्द्र मंच पहुंचा था और वहां रंगकर्मी हेमंत थपलियाल के नाटक से जुड़ा। जब नाटक का मंचन हुआ, तो लोगों ने जमकर तालियां बजाई। अगले दिन न्यूजपेपर में नाटक के रिव्यू मेरा नाम भी प्रकाशित हुआ, इसे लेकर मैं पिता के पास गया और कहा कि डॉक्टर बनकर तो नाम रोशन नहीं कर पाया, लेकिन अपने नाम को अखबार तक तो पहुंचा दिया। यह देखकर वे भी खुश हुए, लेकिन मैंन उस वक्त भी इसे कॅरियर के रूप में नहीं चुना।

विदेश जाने के लिए संगीत को चुना

गगन ने कहा कि पढ़ाई करते हुए कुछ लोगों से पता चला कि संगीत से जुड़े कलाकार विदेश तक पहुंच जाते हैं। ऐसे में मैंने भी संगीत संस्थान जॉइन किया और गिटार के नाम पर मैंने हवाइन गिटार मिला। लेकिन एक-दो महीने बाद ही इसे छोड़ दिया। इसके पिता सीए की पढ़ाई करने के लिए कहने लगे, लेकिन मैंने उनसे रिक्वेस्ट करके थिएटर से जुडऩे की इजाजत मांगी और परमिशन दे दी। वहां से मैं जेकेके की चिल्ड्रन थिएटर वर्कशॉप से जुड़ा, यहां से ट्रेनिंग ली और फिर शहर के वरिष्ठ कलाकारों के नाटकों में बैक स्टेज जुडऩे लगा। यहां के एक्सपीरियंस से लाइटिंग के प्रति समझ बढ़ाने लगा। इस दौरान कुलदीप माथुर को लाइटिंग में असिस्ट करने लगा। सरताज नारायण माथुर ने अपने नाटकों में मौका दिया और फिर थिएटर डायरेक्टर्स का रेस्पॉन्स मिलने लगा और मुझे अपने नाटकों से जोडऩे लगे।

चिल्ड्रन थिएटर और लाइटिंग

एस वासुदेव सिंह से लेकर जयरूप जीवन, साबिर खान जैसे नामचीन थिएटर डायरेक्टर्स ने लाइट डिजाइन के लिए मौका दिया। मेरे काम की वजह से जवाहर कला केन्द्र में ऑफिशियल लाइट डिजाइन के लिए बुलाया जाने लगा। मैंने तब एक्टिंग से ज्यादा लाइट डिजाइन की तरफ ध्यान दिया। इसी का परिणाम रहा कि अब तक ५० से ज्यादा प्ले और २०० से ज्यादा शो में लाइटिंग कर चुका हूं। इसी दौरान चिल्ड्रन थिएटर की तरफ झुकाव हुआ और थिएटर इन एजुकेशन के क्षेत्र में काम करने लगा। अब तक १५ हजार से ज्यादा बच्चों को थिएटर की शिक्षा दे चुका हूं और क्यूरियो संस्था के तहत १५०० बच्चों को थिएटर से जोडऩे में कामयाब हुआ हूं। मेरे लिए अब तक का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट कॉमनवेल्थ गेम्स में लाइटिंग करने का रहा है। यह कार्य संस्कृति मंत्रालय की तरफ से मिला था।

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