मां सरस्वती का ऐसा मंदिर जहां मिलता है महाज्ञान, ऋषि वाल्मीकि ने यहीं लिखी थी रामायण

मां सरस्वती का ऐसा मंदिर जहां मिलता है महाज्ञान, ऋषि वाल्मीकि ने यहीं लिखी थी रामायण

Tanvi Sharma | Publish: Feb, 06 2019 06:09:24 PM (IST) | Updated: Feb, 07 2019 01:23:17 PM (IST) तीर्थ यात्रा

मां सरस्वती का ऐसा मंदिर जहां मिलता है महाज्ञान, ऋषि वाल्मीकि ने यहीं लिखी थी रामायण

10 फरवरी को देशभर में बसंत पंचमी का पर्व मनाया जाएगा। इस पर्व को माता सरस्वती के जन्मदिन के रुप में मनाया जाता है। इसी मौके पर यूं तो सरस्वती जी के हर मंदिर में अक्षर ज्ञान करवाया जाता है। लेकिन यदि मां सरस्वती साक्षात किसी बच्चे को ज्ञान दे तो क्या कहेंगे आप, जी हां शायद आप नहीं जानते की भारत के एक राज्य आंध्रप्रदेश के एक जिले में मां सरस्वति साक्षात दर्शन देती हैं। लोगों का मानना है की यहां स्थित मंदिर में देवी विराजमान रहती है और यहीं उनका निवास स्थान है। मां सरस्वती का यह प्राचीन मंदिर आंध्रप्रदेश के आदिलाबाद जिले के मुधोल क्षेत्र के बासर गांव में स्थित है। लोगों का कहना है कि इस मंदिर को ऋषि वेद व्यास द्वारा बनाया गया था। गोदावरी के तट पर बने इस मंदिर जैसा ही एक अन्य मंदिर जम्मू कश्मीर के लेह में है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां शारदा का निवास दंडकारण्य और लेह में माना जाता है।

ma saraswati

यहां 4 फुट ऊंची है सरस्वती जी की प्रतिमा

मंदिर के गर्भगृह, गोपुरम, परिक्रमा मार्ग आदि इसकी निर्माण योजना का हिस्सा हैं। मंदिर में केंद्रीय प्रतिमा सरस्वती जी की है, साथ ही लक्ष्मी जी भी विराजित हैं। सरस्वती जी की प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में 4 फुट ऊंची है। इस मंदिर का निर्माण चालुक्य राजाओं ने देवी सरस्वती के सम्मान में किया था। आजकल इस मंदिर में पंचमी और नवरात्री जैसे त्योहार बड़े पैमाने पर मनाये जाते हैं। हिंदुओं का एक प्रसिद्ध परंपरा अक्षर ज्ञान भी इस मंदिर में मनाया जाता है।

महाऋषि वेद व्यास को यहीं से हुई थी ज्ञान की अनुभूति

देवी सरस्वती जी के इस मंदिर के विषय में कहते हैं कि महाभारत के रचयिता महाऋषि वेद व्यास जब मानसिक उलझनों से उलझे हुए थे तब शांति के लिए तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े, अपने मुनि वृन्दों सहित उत्तर भारत की तीर्थ यात्राएं कर दंडकारण्य (बासर का प्राचीन नाम) पहुंचे। गोदावरी नदी के तट के सौंदर्य को देख कर कुछ समय के लिए वे यहीं पर रुक गए। और यहीं से उन्हें अपने ज्ञान की अनुभूति हुई।

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वाल्मीकि ऋषि ने यहीं किया था रामायण लेखन

मां सरस्वती के मंदिर से थोडी दूर स्थित दत्त मंदिर से होते हुए मंदिर तक गोदावरी नदी में कभी एक सुरंग हुआ करती थी, जिसके द्वारा उस समय के महाराज पूजा के लिए आया-जाया करते थे। यहीं वाल्मीकि ऋषि ने रामायण लेखन शुरु करने से पहले सरस्वती जी को प्रतिष्ठित किया और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर उन्होंने रामायण लिख दी। इस मंदिर के पास ही वाल्मीकि जी की संगमरमर की समाधि भी बनी हुई है।

मंदिर के एक सतंभ में आती है सातों सुरों की आवाज़

मंदिर में एक स्तंभ भी है जिसमें से संगीत के सातों स्वर सुने जा सकते हैं। यहां की विशिष्ट धार्मिक रीति अक्षर आराधना कहलाती है। इसमें बच्चों को विद्या अध्ययन प्रारंभ कराने से पूर्व अक्षराभिषेक हेतु यहां लाया जाता है और प्रसाद में हल्दी का लेप खाने को दिया जाता है। बासर गांव में 8 ताल हैं जिन्हें वाल्मीकि तीर्थ, विष्णु तीर्थ, गणेश तीर्थ, पुथा तीर्थ कहा जाता है।

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