अत्यंत चमत्कारी है दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ, विराजमान हैं बिना सिर वाली देवी

अत्यंत चमत्कारी है दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ, विराजमान हैं बिना सिर वाली देवी

Tanvi Sharma | Publish: Oct, 17 2018 06:29:46 PM (IST) तीर्थ यात्रा

अत्यंत चमत्कारी है दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ, विराजमान हैं बिना सिर वाली देवी

देवी मां के शक्तिपीठों में से दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित है। यह शक्तिपीठ छिन्नमस्तिका मंदिर से प्रसिद्ध है। मां छिन्नमस्तिके मंदिर रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां ना केवल राज्य, देश बल्कि विश्वभर से भक्त माता के दर्शन के लिए आते हैं। श्रीयंत्र का स्वरूप छिन्नमस्तिका दस महाविद्याओं में छठा रूप मानी जाती है। यह मंदिर दामोदर-भैरवी संगम के किनारे त्रिकोण मंडल के योनि यंत्र पर स्थापित है, जबकि पूरा मंदिर श्रीयंत्र का आकार लिए हुए है। लाल-नीले और सफेद रंगों के बेहतर समन्वय से मंदिर बाहर से काफी खूबसूरत लगता है।

 

chinnamastika

मां का यह स्वरूप देखने में भयभीत भी करता है। मंदिर में उत्तरी दीवार के साथ रखे शिलाखंड पर दक्षिण की ओर मुख किए छिन्नमस्तिका के दिव्य स्वरूप का दर्शन होता है। मंदिर में स्‍थापित माता की प्रतिमा में उनका कटा सिर उन्हीं के हाथों में है, और उनकी गर्दन से रक्त की धारा प्रवाहित होती रहती है। जो दोनों और खड़ी दोनों सहायिकाओं के मुंह में जाता है। शिलाखंड में देवी की तीन आंखें हैं। इनका गला सर्पमाला और मुंडमाल से शोभित है। बाल खुले हैं और जिज्ज बाहर निकली हुई है। आभूषणों से सजी मां नग्नावस्था में कामदेव और रति के ऊपर खड़ी हैं। दाएं हाथ में तलवार लिए हैं। पुराणों में भी रजरप्पा मंदिर का उल्लेख शक्तिपीठ के रूप में मिलता है।

मंदिर में बलि स्थानों के बीच मन्नत मांगने के लिए बांधे जाते हैं पत्थर

मंदिर में चार दरवाजे हैं और मुख्य दरवाजा पूरब की ओर है। मुख्य द्वार से निकलते हुए मंदिर से नीचे उतरते ही दाहिनी ओर बलि स्थान है वहीं बाईं और नारियल बलि का स्थान है। इन दोनों बलि स्थानों के बीच में मन्नते मांगने के लिए लोग रक्षासूत्र में पत्थर बांधकर पेड़ व त्रिशूल में लटकाते हैं उसके बाद मन्नत पूरी हो जाने पर उन पत्थरों को दामोदर नदी में प्रवाहित करने की परंपरा है। यहां मुंडन कुंड पर लोग मुंडन के समय स्नान करने की परंपरा हैं। जबकि पापनाशिनी कुंड को रोगमुक्ति प्रदान करने वाला माना जाता है। सबसे खास दामोदर और भैरवी नदियों पर अलग-अलग बने दो गर्म जल कुंड हैं। नाम के अनुरूप ही इनका पानी गर्म है और मान्यता है कि यहां स्नान करने से चर्मरोग से मुक्ति मिल जाती है।

 

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रात में यहां विचरण करती है मां

यहां हर साल नवरात्रि के समय बड़ी संख्या में साधु-संत और श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर में 13 हवन कुंडों में विशेष अनुष्ठान कर सिद्धि की प्राप्ति करते हैं। मंदिर रजरप्पा जंगलों से घिरा हुआ है। जहां दामोदर व भैरवी नदी का संगम भी है। शाम होते ही पूरे इलाके में सन्नाटा पसर जाता है। लोगों का मानना है कि मां छिन्नमिस्तके यहां रात्रि में विचरण करती है। इसलिए एकांत वास में साधक तंत्र-मंत्र की सिद्धि प्राप्ति में जुटे रहते हैं। दुर्गा पूजा के मौके पर आसाम, पश्चिम बंगाल, बिहार, छत्तिसगढ़, ओड़िशा, मध्य प्रदेश, यूपी समेत कई प्रदेशों से साधक यहां जुटते हैं। मां छिन्नमस्तिके की विशेष पूजा अर्चना कर साधना में लीन रहते हैं।

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