यहां भगवान शिव के हर रोज़ दर्शन करने आता है गिद्धों का जोड़ा, चमत्कारी है यह मंदिर

यहां भगवान शिव के हर रोज़ दर्शन करने आता है गिद्धों का जोड़ा, चमत्कारी है यह मंदिर

Tanvi Sharma | Publish: Sep, 26 2018 06:45:00 PM (IST) तीर्थ यात्रा

यहां भगवान शिव के हर रोज़ दर्शन करने आता है गिद्धों का जोड़ा, चमत्कारी है यह मंदिर

भारत में बहुत से चमत्कारी और अद्भुत शिव मंदिर हैं, जिनका चमत्कार देखने वालों को भरोसा नहीं होता लेकिन ऐसे मंदिरों में से एक मंदिर ऐसा भी है जिसमें भगवान शिव के दर्शन करने हर रोज़ गिद्धों का जोड़ा आता है। यह मंदिर चेन्नई के चेंगलपेट्ट से 13 किमी दूर स्थित तिरूकल्लीकुण्ड्रम पक्षी तीर्थ नाम से प्रसिद्ध है। मान्यताओं के अनुसार यहां वर्षों से गिद्धों का जोड़ा रोज़ आता है और शिव जी के दर्शन करता है। पुजारियों का कहना है की दर्शन करने आए गिद्धों को भगवान शिव को लगा भोग प्रसाद खिलाया जाता था। लेकिन पिछले कुछ सालों से यहां गिद्ध का जोड़ा नहीं आया इस विषय में पुजारियों का कहना है की कलयुग का पाप बढ़ जाने से गिद्धों ने आना बंद किया है।

 

pakshi tirth

पक्षी तीर्थ वेद गिरि पहाड़ी के एक ओर समतल स्थान पर है। यहां दिन में 11 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच पक्षियों के दर्शन होते हैं। मान्यता है कि ये पक्षी कैलाश पर्वत से आते हैं। उसके बाद गिद्ध वाराणसी में गंगा में डूबकी लगाकर वहां से उड़कर यहां आते। यहां दोपहर को मंदिर के पुजारी उनको भोजन कराते थे जिसमें चावल, गेहूं, घी और शक्कर होता था। भोजन करने के बाद गिद्ध रामेश्वरम जाते थे और रात चिदंबरम में बिताते थे। इसी प्रकिया को वे हर रोज़ दोहराते थे। अंतिम बार जोड़े रूप में गिद्धों को 1998 में देखा गया। उसके बाद केवल एक गिद्ध यहां आता है।

 

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पौराणिक कथा के अनुसार ये है मान्यता

पौराणिक कथाओं के अनुसरा सदियों पहले चार गिद्धों के जोड़े थे। ये चार जोड़े आठ मुनियों के प्रतीक थे जिनको भगवान शिव ने शाप दिया था। हर एक युग में एक जोड़ा गायब होता चला गया। इस स्थल को उर्तरकोडि, नंदीपुरी, इंद्रपुरी, नारायणपुरी, ब्रह्मपुरी, दिनकरपुरी और मुनिज्ञानपुरी नाम से भी जाना जाता था। किंवदंती के अनुसार भारद्वाज मुनि ने भगवान शिव से दीर्घायु का वरदान मांगा ताकि वे चारों वेदों का अध्ययन कर सकें। भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हुए और उनको वेद सीखने का वरदान दिया। शिव ने इसके लिए तीन पर्वतों का निर्माण किया जो ऋग, यजुर व साम वेद के प्रतीक है। जबकि अथर्ववेद रूपी पर्वत से वे स्वयं प्रकट हुए। शिव ने हाथ में मिट्टी लेते हुए समझाया कि प्रिय भारद्वाज वेदों का अध्ययन मेरे हाथ की मिट्टी और खड़े पर्वतों की तरह है। अगर वेद सीखने के लिए तुम दीर्घायु होना चाहते हो लेकिन यह समझ लो कि सीखने का क्रम कभी समाप्त नहीं होता और इससे मोक्ष की प्राप्ति भी नहीं होती।

भगवान ने उपदेश दिया कि कलियुग में भक्ति से ही मोक्ष संभव है। यह मान्यता है कि वेदगिरिश्वरर का जो मंदिर जिस पर्वत पर है वह वेदों का स्वरूप है। इस वजह से शिव की आराधना वेदगिरिश्वरर के रूप में होती है जिसका आशय वेद पर्वतों के अधिपति हैं। इस पर्वत को पवित्र माना गया है और इसकी भी परिक्रमा की जाती है।

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