गुरु ने पीएम मोदी को दी थी चुनौती, शागिर्द ने 8 बार के सांसद को दी शिकस्त

गुरु ने पीएम मोदी को दी थी चुनौती, शागिर्द ने 8 बार के सांसद को दी शिकस्त

Amit Kumar Bajpai | Publish: May, 24 2019 11:10:33 PM (IST) | Updated: May, 25 2019 07:40:33 AM (IST) राजनीति

  • गुरुजी को उनके ही शागिर्द ने दी शिकस्त
  • झामुमो अध्यक्ष शिबू सोरेन हारे चुनाव
  • अपनी सीट पर जीत के लिए थे आश्वस्त

नई दिल्ली। इस बार लोकसभा चुनाव में एक बड़ा नाटकीय उलटफेर देखने को मिला है। चुनाव के दौरान पीएम मोदी को चुनौती देने वाले 8 बार के सांसद रहे 'गुरु' को उनकी ही सीट पर उनके शागिर्द ने शिकस्त दे दी। यह वाक्या है झारखंड की दुमका संसदीय सीट का, जहां पर भाजपा के सुनील सोरेन ने आदिवासियों के मशहूर नेता शिबू सोरेन का हरा दिया।

इस लोकसभा चुनाव में भी झारखंड में सत्तारूढ़ भाजपा ने वर्ष 2014 में हासिल अपनी जीत का आंकड़ा बरकरार रखा। भाजपा ने सहयोगी दलों की साझेदारी में यहां की 14 में से 12 सीटें कब्जा लीं। 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा यहां पर अकेले लड़ी थी और 12 सीटें जीती थीं। पार्टी ने इस बार गिरिडीह सीट को ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) को दे दिया था।

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हालांकि इस बार सिंहभूम लोकसभा सीट को भाजपा हार गई, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण दुमका सीट को झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से छीन लिया। जब से झारखंड का गठन हुआ है, उसके बाद से अब पहली बार भाजपा ने दुमका सीट पर कब्जा जमाया है। यह निर्वाचन क्षेत्र संथाल परगना मंडल में आता है, जो पिछले 30 साल से झामुमो का गढ़ रहा है। दुमका के अलावा गोड्डा और राजमहल सीटें भी इसी मंडल के अंतर्गत आती हैं।

भाजपा के खिलाफ महागठबंधन के लिए हेमंत अधिकृत-शिबू सोरेन (फाइल फोटो)

झामुमो के अध्यक्ष शिबू सोरेन वर्ष 1998 और 1999 को छोड़कर वर्ष 1991 से लगातार दुमका से जीतते रहे हैं। इस बार भाजपा के सुनील सोरेन ने उन्हें 47,590 वोटों से हरा दिया। सुनील सोरेन एक वक्त शिबू सोरेन के शागिर्द माने जाते थे। सुनील 2009 से ही इस सीट के लिए संघर्ष कर रहे थे। वर्ष 2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव में सुनील को शिकस्त मिली थी। पिछले लोकसभा चुनाव में शिबू केवल 39 हजार वोटों से ही सुनील को पीछे छोड़ सके थे।

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झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ने 2014 में कार्यभार संभालने के बाद अपना ध्यान संथाल परगना पर केंद्रित किया। बीते चार वर्षों में हुए उपचुनावों में भाजपा इस मंडल में कामयाब नहीं हो पाई थी। इस बार यह पार्टी इच्छित परिणाम पाने में कामयाब रही। पार्टी ने इस बार दुमका सीट तो छीन ली, लेकिन झामुमो के सांसद विजय कुमार हंसदक से राजमहल सीट नहीं छीन पाई। इस सीट पर भाजपा 99,115 वोटों से पीछे रह गई।

इस बार झारखंड विकास मोर्चा-प्रजातांत्रिक के अध्यक्ष और पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी भी चुनाव हार गए। खूंटी सीट पर भाजपा के अर्जुन मुंडा ने उन्हें केवल 1,400 वोटों के अंतर से पीछे छोड़ दिया।

शिबू सोरेन की शिकस्त का कारण बुढ़ापा और अति आत्मविश्वास माना जा रहा है। पूरे इलाके में गुरुजी के नाम से मशहूर शिबू सोरेन तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। यहां पर इस लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण में 19 मई को मतदान हुआ था।

चुनाव के दौरान एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत में शिबू सोरेन का कहना था, "यहां पर मोदी हमारा कुछ नहीं कर सकते। चुनाव की तैयारी करने का इकलौता तरीका है कि लोगों के बीच जाओ और उनसे मिलो। इसके अलावा कुछ मायने नहीं रखता।" शिबू की सक्रियता कम होने से क्या वह अब सत्ता छोड़ देंगे के सवाल पर वह जवाब देते हैं, "नहीं, जब तक मैं जिंदा हूं चुनाव लड़ता रहूंगा।"

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शिबू सोरेन के बारे में पार्टी के महासचिव विनोद पांडेय कहते हैं, "गुरुजी एक राजनेता से कहीं ज्यादा हैं। उन्होंने आदिवासियों को आवाज दी है।" गुरुजी अब पार्टी की गतिविधियां या कार्यों को नहीं देखते। कुछ मिनटों से ज्यादा वह बैठकों को भी संबोधित नहीं करते। पार्टी के पदाधिकारी बार-बार उनके स्वास्थ्य का हवाला देते हुए उन्हें आराम की जरूरत बताते हैं। वह पार्टी के कार्यक्रमों में शामिल तो होते हैं, लेकिन ज्यादातर वक्त शांत ही रहते हैं।

 

शिबू सोरेन

भूतपूर्व मुख्यमंत्री हेमंत मानते हैं कि शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत वास्तव में पारिवारिक नहीं हो सकती यहां तक की समर्थन वाली भी नहीं। वह कहते हैं, "किसी के पास भी गुरुजी जैसी ताकत नहीं है। अब मैं ढूंढ़ूगा कि कैसेे कुछ ताकत मुझमें समा जाए।"

शिबू सोरेन ने जेएमएम को एक आदिवासी पार्टी के रूप में खड़ा किया और अपने शुरुआती दिनों में बाहरी लोगों के खिलाफ अभियान चलाया।

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