एक ही महीने में भाजपा के दो 'सूर्य' हुए अस्त, विपक्ष की आंखें भी नम

एक ही महीने में भाजपा के दो 'सूर्य' हुए अस्त, विपक्ष की आंखें भी नम
एक ही महीने में बीजेपी के अस्त हो गए दो 'अरुण'

Prashant Kumar Jha | Updated: 25 Aug 2019, 04:55:51 PM (IST) राजनीति

  • विपक्ष भी सुषमा और जेटली को याद करेगा
  • 6 अगस्त को पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का निधन
  • बीजेपी के हर मोर्चे पर बचाया गया

नई दिल्ली। साल 2019 का अगस्त महीना भारतीय जनता पार्टी के लिए भारी नुकसान भरा रहा। पार्टी ने एक ही महीने के अंदर दो बड़े नेताओं को खो दिया है । शानदार अधिवक्ता, कुशल रणनीतिकार और वरिष्ठ नेता के तौर पर जाने जाते और पूर्व विदेश मंत्री अरुण जेटली का आज निधन हो गया। लंबी बीमार के बाद दिल्ली के एम्स में उन्होंने आखिरी सांस ली। इससे पहले 6 अगस्त की शाम पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज दुनिया छोड़कर चली गई।

भाजपा की अपूर्णीय क्षति

इन दोनों नेताओं के असमय जाने से भाजपा को अपूर्णीय क्षति हुई है। भाजपा साल 2019 में भले ही पूर्ण बहुमत से सत्ता में लौटी हो। लेकिन बीजेपी के इन दो नेताओं ने पार्टी को उस समय बिखरने से बचाया था जब 2009 में लोकसभा चुनाव में हार के बाद कार्यकर्ताओं में निराशा थी।

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2009 में लोकसभा और राज्यसभा में दोनों नेताओं ने संभाला था मोर्चा

लोकसभा में विपक्ष के नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में अरुण जेटली ने मोर्चा संभाला था। उसके बाद 2 जी से लेकर कॉमनवेल्थ गेम्स, महंगाई जैसे मुद्दों पर दोनों नेताओं ने मनमोहन सिंह सरकार को हर मोर्चे पर घेरा । विपक्ष में शानदार भूमिका निभाने वाले इन दो नेताओं ने तथ्यों और अपनी भाषण कला के दम पर संसद में सरकार पर लगातार हमला बोला। वह चाहे फर्जी कंपनियों के खिलाफ मोर्चा खोलना हो या फिर भ्रष्टाचार । घोटालों से घिरी यूपीए-2 की सरकार को इन नेताओं ने जनता के सामने बेनकाब कर दिया।

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हिंदुत्व की राजनीति पर पार्टी को ऐसे बचाते थे दोनों नेता

दोनों नेताओं में जो एक समानता थी वह यह कि दोनों पेशे से वकील थे। राजनीति में आने से पहले दोनों वकालत करते थे। अटल जी की सरकार में दोनों एक साथ मंत्री बने। बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति पर जब भी सवाल खड़े हुए तो सुषमा और जेटली बाखूबी इसका जवाब देते थे। सुषमा स्वराज जहां बीजेपी में समाजवादी राजनीति से आई थीं तो जेटली की सोच उदारवादी और प्रगतिशील थी। संसद में उनका सामना कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और राम जेठमलानी जैसे बड़े वकीलों से बहस होती थी।

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