अयोध्या विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले फैसले में तीसरे पक्षों की सभी याचिकाएं खारिज की

Dhirendra Mishra

Publish: Mar, 14 2018 03:49:22 PM (IST) | Updated: Mar, 14 2018 03:52:04 PM (IST)

राजनीति
अयोध्या विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले फैसले में तीसरे पक्षों की सभी याचिकाएं खारिज की

राम मंदिर मुद्दे पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पहला झटका इस विवाद से जुड़े तीसरे पक्ष को दिया।

नई दिल्‍ली. राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद की जमीन पर मालिकाना हक की लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई शुरू हो गई। इस मामले में पहला अहम फैसला देते हुए शीर्ष अदालत ने तीसरे पक्ष को झटका दिया है। उनकी सभी हस्तक्षेप याचिकाएं खारिज कर दी है। सुनवाई शुरू होने के बाद कोर्ट ने हस्तक्षेप याचिकाओं के बारे में अलग-अलग जानकारी हासिल की।

स्‍वामी की या‍चिका का मुस्लिम पक्षकारों ने किया विरोध
जब सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी याचिका के आधार पर पक्ष दावा किया तो विरोधी वकीलों ने इसका विरोध किया। मुस्लिम पक्ष के राजीव धवन ने कहा कि स्वामी की याचिका को नहीं सुना जाए। इस पर नाराज़ स्वामी बोले कि ये लोग पहले भी कुर्ता-पजामा के खिलाफ बोल चुके हैं। सरकार की ओर से एएसजी तुषार मेहता ने भी कहा कि तीसरे पक्षों यानी हस्तक्षेप याचिकाओं को इस समय सुना जाना उचित नहीं होगा। मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा कि हस्तक्षेप याचिका दायर कर कोर्ट में पहली कतार में बैठने का ये मतलब नहीं कि उनको पहले सुना जाए। इस पर स्वामी ने पलटकर जवाब दिया कि पहले ये लोग मेरे कुर्ते-पाजामे पर सवाल उठा चुके हैं और अब अगली कतार में बैठने पर सवाल उठा रहे हैं।

तीन जजों की बेंच तय करेगी सुनवाई की दिशा
आपको बता दें कि एक फरवरी की सुनवाई में अदालत ने 14 मार्च से लगातार सुनवाई करने की बात कही थी। 8 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार के सामने हुई मीटिंग में सभी पक्षों ने कहा कि काग़जी कार्रवाई और अनुवाद का काम लगभग पूरा हो गया है। इस मामले में हाई कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ सबसे पहले सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लिहाज़ा पहले बहस करने का मौका उन्हें मिल सकता है। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने काग़जी कार्रवाई और अनुवाद का काम पूरा करने के आदेश दिए थे। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई में तीन जजों की बेंच सुनवाई की दिशा तय करेगी। यह विवाद विवाद लगभग 68 वर्षों से कोर्ट में है। देश के शीर्ष अदालत के समक्ष सभी पक्षकार राम मंदिर-मस्जिद विवाद पर आज से निर्णायक दलील पेश करेंगे।

सुन्‍नी बोर्ड ने दस्‍तावेजों का अनुवाद कराने की मांग की थी
इस मामले से जुड़े सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड ने एक फरवरी को 9,000 पन्नों के दस्तावेज और 90,000 पन्नों में दर्ज गवाहियां पाली, फारसी, संस्कृत, अरबी सहित विभिन्न भाषाओं में हैं, जिस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कोर्ट से इन दस्तावेजों को अनुवाद कराने की मांग की थी। वक्‍फ बोर्ड का कहना था कि वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस और गीता सहित 20 धार्मिक पुस्तकों से इस्तेमाल किए तथ्यों का अंग्रेजी में अनुवाद न होने से सुनवाई हो पाना संभव नहीं है जिसके चलते सुनवाई टालनी पड़ी थी। सुनवाई के दौरान पक्षकारों के वकील ने कहा था कि अयोध्या विवाद लोगों की भावनाओं से जुड़ा है। इस पर मुख्‍य न्‍यायाधीश ने कहा था कि ऐसी दलीलें मुझे तर्कसंगत नहीं है। अब यह मसला सिर्फ भूमि विवाद का है।

मुख्य पक्षकारों मिलेगा पहले दलील पेश करने का मौका
सुप्रीम कोर्ट ने एक फरवरी की सुनवाई में कहा था कि सबसे पहले इस विवाद से जुड़े मुख्‍य पक्षकारों की दलीलें सुनी जाएंगी। उसके बाद अन्‍य पक्षकारों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा। आपको बता दें कि इस मामले में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, राम लला विराजमान और निर्मोही अखाड़ा के अलावा एक दर्जन अन्य पक्षकार भी हैं।

2019 तक सुनवाई टालने की अपील
एक फरवरी को हुई चुनाव के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट से इस केस की सुनवाई 2019 तक लोकसभा चुनावटालने की मांग की थी। उन्होंने अदालत से अपील की थी कि इसके प्रभाव को देखते हुए इस मामले की सुनवाई होनी चाहिए। उन्‍होंने कहा कि हम अदालत को यकीन दिलाते हैं कि हम किसी भी तरह से इसे और आगे नहीं बढ़ने देंगे। केवल न्याय ही नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये किस तरह की पेशकश है? इससे पहले मामले की सुनवाई क्‍यों नहीं हो सकती? इसका जवाब कपिल सिब्‍बल नहीं दे पाए थे। इसके बाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी भी सुनवाई को टालने की कई बार अपली कर चुके हैं।

शिया बोर्ड का प्रस्‍ताव
उत्तर प्रदेश के शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में एक प्रस्‍ताव पेश किया था। इसके मुताबिक विवादित जगह पर राम मंदिर बनाया जाए और मस्जिद लखनऊ में बनाई जाए। इस मस्जिद का नाम राजा या शासक के नाम पर रखने के बजाए मस्जिद-ए-अमन रखा जाए।

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