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राजनीति

सुर्खियों से दूर रहकर कार्य करने में यकीन रखते हैं भूपेंद्र यादव

चुनावी रणनीतिकार के साथ मंत्री के रूप में भी छोड़ी छाप
भूपेंद्र यादव के वन, पर्वावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री रहते ही देश में सफल हुआ चीता प्रोजेक्ट
संसदीय समितियों में रहने के कारण कमेटी मैन के रूप में है पहचान

नई दिल्लीJun 29, 2024 / 03:21 pm

Navneet Mishra

नवनीत मिश्र

नई दिल्ली। भाजपा में भूपेंद्र यादव ऐसे नेता हैं, जो सुर्खियों से दूर रहकर कार्य करने में यकीन रखते हैं। संगठन से लेकर सरकार में बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां संभालने के कारण वे हाईप्रोफाइल नेताओं में गिने जाते हैं, फिर भी रहते लो-प्रोफाइल ही हैं। यही खासियत उन्हें भीड़ से अलग करती है और पार्टी नेतृत्व की नजर में उपयोगिता भी बनाती है। देश के लगातार दूसरी बार पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री बने भूपेंद्र यादव की पहचान एक सफल चुनावी रणनीतिकार की भी रही है।
भूपेंद्र यादव का राजस्थान और हरियाणा दोनों राज्यों से गहरा रिश्ता है। हरियाणा के गुरुग्राम जिले में जमालापुर जहां पैतृक गांव है तो राजस्थान के अजमेर उनकी शुरुआती कर्मभूमि रही। 30 जून 1969 को जन्मे भूपेंद्र यादव अजमेर के राजकीय कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई करते हुए वे छात्रसंघ अध्यक्ष चुनाव लड़े और जीते। एलएलबी करने के बाद वकालत में उतरे तो सुप्रीम कोर्ट के वकील भी बन गए। संघ से संबंद्ध अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद से 2000 में जुड़कर 2009 तक बतौर महासचिव कार्य करते रहे। 1992 में गुरुग्राम में भाजयुमो के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

गडकरी ने दी एंट्री, शाह ने दिया सर्वाधिक मौका

तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने 2010 में भूपेंद्र यादव को राष्ट्रीय सचिव के तौर पर पार्टी में एंट्री दी, फिर वे पीछे मुड़कर नहीं देखे। 2012 में राजस्थान से पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा। इस बीच 2014 में अमित शाह राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो उन्होंने भूपेंद्र यादव का कद बढ़ाते हुए उन्हें महासचिव बना दिया। फिर गुजरात, बिहार, महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के चुनाव प्रभारी रहते पार्टी को शानदार सफलता दिलाई। कैबिनेट मंत्री के साथ 2023 में मध्य प्रदेश का चुनाव प्रभारी रहते हुए उन्होंने 163 सीटों से जीत में अहम भूमिका निभाई। भूपेंद्र यादव, 1992 में विवादित ढांचा विध्वंस केस की जांच से जुड़े लिब्रहान आयोग के सरकारी वकील भी रह चुके हैं।

मंत्री के रूप में छोड़ी छाप

मोदी सरकार में जुलाई 2021 में हुए फेरबदल के दौरान पहली बार भूपेंद्र यादव को बतौर कैबिनेट मंत्री जगह मिली। उन्हें पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन के साथ श्रम एवं रोजगार जैसा बड़ा मंत्रालय भी मिला। पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री के रूप में ग्लासगो में 26 वें संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में उन्होंने भारत की आवाज उठाई।

कमेटी मैन की पहचान

भूपेंद्र यादव सर्वाधिक संसदीय समितियों के अध्यक्ष और सदस्य भी रहे हैं। इसलिए उन्हें कमेटी मैन भी कहा जाता है। दिवाला और दिवालियापन संहिता 2015 पर बनी संयुक्त समिति के अध्यक्ष और जीएसटी विधेयक की राज्यसभा चयन समिति के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। राज्यसभा सांसद रहते अब तक एक दर्जन से अधिक संसदीय समितियों की अध्यक्षता कर चुके हैं।

एनओसी सिस्टम कर दिया आसान

भूपेंद्र यादव ने वन, पर्यावण और जलवायु परिवर्तन मंत्री रहते हुए उद्योगों के लिए पर्यावरण एनओसी की व्यवस्था आसान करने की पहल की। पिछली सरकारों में पर्यावरण संबंधी अनुमति लेने के लिए उद्योगों को जहां 600 दिन लगते थे, अब यह समय घटकर मात्र 75 दिन रह गया है। 16 विभागों के कार्यों को एक छत के नीचे लाने और व्यवस्था के डिजिटलीकरण के कारण यह संभव हुआ है।

चीतों को लाने वाले मंत्री

भूपेंद्र यादव के पर्यावरण मंत्री कार्यकाल में ही 2022 में चीतों को भारत लाने का प्रोजेक्ट शउरू हुआ। उन्होंने जीवों के संरक्षण पर विशेष जोर दिया। उनके कार्यकाल में इन प्रयासों की वजह से बाघ और हिम तेंदुओं की संख्या में भी इजाफा हुआ। भूपेंद्र यादव वन और पर्यावरण में पहले से गंभीर रुचि रखते हैं। वे सुप्रीम कोर्ट ऑन फॉरेस्ट कंजर्वेशन पुस्तक भी लिख चुके हैं।

चुनौतियां

प्रदूषण से निबटना
जैव विविधता संरक्षण
अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान
2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में कार्य
वन अग्नि प्रबंधन

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