तालाब में डलता था रसायनिक कचरा, वहां हो रही खेती, संगठन बोले सिंघाड़े हटाने से नहीं जमीन के अंदर जहर हटाना जरूरी

- जुलाई १९७८ में तत्कालीन एमपी स्टेट प्रीवेंशनल एंड कंट्रोल ऑफ वॉटर पॉल्युशन बोर्ड वर्तमान में पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड ने जहरीले पानी पीने से पशुओं के मरने पर जारी किए नोटिस, लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं की,
- जिन तालाबों को पन्नी बिछाकर जहरीला कचरा डंप किया जाता था, उन्हीं तालाबों में आज सिंघाड़े की हो रही है, विभाग तब भी मौन और आज मौन

By: प्रवेंद्र तोमर

Published: 08 Oct 2021, 10:48 PM IST

भोपाल. यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर में रासायनिक कचरे को डंप करने के लिए २१ साइटों के अलावा तीन तालाब भी बनाए थे। इन तालाबों में पन्नी बिछाकर रासायनिक कचरा डाला जाता रहा। चंद वर्षों में ही पानी जहरीला हो गया था, पीने से पशुओं की मृत्यु होने लगी। इस बात का खुलासा ७ जुलाई १९७८ को यानि आज से ठीक ४३ वर्ष पहले पशुओं की मौत के बाद यूका को लिखे गए प्रीवेंशनल एंड कंट्रोल ऑफ वॉटर पॉल्यूशन बोर्ड और वर्तमान में एमपीपीसीबी (एमपी पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड) के पत्र से हो चुका है। इसके बाद भी तालाब में सिंघाड़ों की खेती की जा रही है। कहने को तालाबों की नियमित सफाई के दौरान इसे भी साफ किया जा रहा है, लेकिन ये इतनी मात्रा में है कि इसे साफ करना फिलहाल संभव नहीं है। इसी बीच लोग इसमें से सिंघाड़े ले जा रहे हैं। गैस पीडि़त संघटनों की मांग है कि सिर्फ संघाड़े साफ करने से कुछ नहीं होगा, जमीन के अंदर जब तक सफाई नहीं होगा कुछ नहीं हो सकता। पोल खुलने के डर से तालाब के सिंघाड़ों की जांच भी नहीं कराई जाती।

गैस कांड वर्ष १९८४ तक इसमें कई पशुओं की मौत हुई, अगर उसी समय जिम्मेदार इस मामले को गंभीरता से लेकर जांच करते तो शायद ये नौबत नहीं आती। माना की वर्षों से उसमें जहरीला कचरा नहीं मिला, लेकिन नीचे जमा केमिकल, पारा। सिंघाड़े की खेती को विषेला बना रहा है। इन सिंघाड़ों को लोग वर्षों से खा रहे हैं। धीमा जहर उनके शरीर में जा रहा होगा। एमपीपीसीबी (एमपी पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड) के अधिकारी इस मामले की गंभीरता से जांच करें तो आने वाले समय में गंभीर घटना होने से बच सकती है।

३३७ मीट्रिक वो कचरा जिसे हादसे के बाद समेट कर रखा

यूका के कर्मचारी टीआर चौहान ने बताया कि हादसे के बाद ३३७ मीट्रिक टन कचरा वो है जिसे हादसे के बाद समेटकर गोदामों में रखा है। इसमें लाइम स्टोन, कास्टिक सोडा, एसिडिक मटेरियल व अन्य कचरा है। फैक्ट्री का काफी एरिया बाद में डिस्मेंटल कर दिया गया। अब तो सिर्फ बेकार का ढांचा ही खड़ा है। जो जगह खतरनाक है, उनमें आज भी कई स्थानों पर लोग नहीं जा सकते। उनके लिए अनुमति लेना जरूरी है। हादसे के बाद भी काफी समय तक हम लोग वहां ड्यूटी करते थे। बाद में सब बंद कर दिया। बंद फैक्ट्री में काफी हिस्से एेसे हैं जिनमें पारा और रसायनों की गंध आज भी भरी है। अगर इनका वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण नहीं हुआ तो कोई फायदा नहीं होगा।

वर्जन
हमारा कहना है कि सिर्फ सिंघाड़े साफ करने से तालाब साफ नहीं होगा। इसके अंदर और आस-पास जमीन में २१ जगह दबे गड्ढों को के रसायनों को साफ करना होगा। वर्ना लोग इसी प्रकार धीमा जहर लेते रहेंगे। जिम्मदार सिंघाड़े की जांच भी नहीं कराते हैं।

रचना ढींगरा, सदस्य, भोपाल ग्रुप इंफॉर्मेशन एंड एक्शन

प्रवेंद्र तोमर Reporting
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