प्रियंका की राजनीति में एंट्री से सियासी घमासान, जानें क्या हैं कांग्रेस का चुनावी दांव?

प्रियंका की राजनीति में एंट्री से सियासी घमासान, जानें क्या हैं कांग्रेस का चुनावी दांव?

Mohit sharma | Publish: Jan, 25 2019 10:54:54 AM (IST) | Updated: Jan, 25 2019 11:46:40 AM (IST) राजनीति

लोकसभा चुनाव से ऐन पहले प्रियंका गांधी के रूप में अपना ट्रंप कार्ड खेल दिया है। कांग्रेस ने प्रियंका का पार्टी का महासचिव नियुक्त करते हुए उनको पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी है।

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव से ऐन पहले प्रियंका गांधी के रूप में अपना ट्रंप कार्ड खेल दिया है। कांग्रेस ने प्रियंका का पार्टी का महासचिव नियुक्त करते हुए उनको पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी है। इसके साथ ही कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में प्रियंका के साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधे को भी लगाया है। इससे साफ पता चलता है कि कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश की कितनी बड़ी अहमियत है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस प्रियंका के माध्यम से उत्तर प्रदेश में अपनी खाई हुई सियासी जमीन वापस पाना चाहती है या फिर यह एक उसका सियासी दांव है?

 

2019 lok sabha election

प्रियंका के आने से जहां लोकसभा चुनाव का मुकाबला रोचक हो गया है, वहीं भाजपा समेत कुछ ऐसे भी दल है जो कांग्रेस के इस फैसले के बाद अपनी रणनीति पर पुनर्रविचार को मजबूर हो गए हैं। हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने साफ किया है कि उनके निशाने पर कोई और नहीं केवल भारतीय जनता पार्टी है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो प्रियंका के सक्रिय राजनीति में उतरने से भाजपा को कम, बल्कि सपा-बसपा गठबंधन को नई चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। इसका एक कारण यह भी है कि उत्तर प्रदेश में 12 जनवरी को हुए सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस बिल्कुल किनारे कर दिया गया। जिसके बाद कांग्रेस के वहां अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर डाली।

कांग्रेस को क्या हासिल होने की उम्मीद है?

दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत तक पहुंचाने में उत्तर प्रदेश की अहम भूमिका थी। उसने राज्य की 80 में से 71 सीटें जीती थीं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस प्रदर्शन को दोहराया। 2014 और 2017 के चुनावों में भाजपा की वोट हिस्सेदारी 42.6% और 40% थी। 2014 और 2017 दोनों में, बसपा, सपा और कांग्रेस का संयुक्त वोट शेयर लगभग 50% था। इन तीनों दलों के बीच कांग्रेस का सबसे कम वोट शेयर 2014 में 7.5% और 2017 में 6.3% था। अब सवाल यह है कि बसपा-रालोद-सपा महागठबंधन का हिस्सा नहीं होने से कांग्रेस को क्या हासिल होने की उम्मीद है?

लड़ाई कांग्रेस की विचारधारा को बचाने के लिए

प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया की पूर्व और पश्चिम उत्तर प्रदेश के महासचिव के रूप में नियुक्ति के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का बयान इस कदम के पीछे पार्टी की नई रणनीति का संकेत देता है। दरअसल, इस कदम के तुरंत बाद राहुल गांधी ने कहा था कि मायावती और अखिलेश से हमारी कोई दुश्मनी नहीं है, वास्तव में वह उनका बहुत सम्मान करता हूं। हम जहां भी संभव हो, उनके साथ सहयोग करने के लिए तैयार हैं। आखिरकार हम तीनों का उद्देश्य बीजेपी को हराना है, लेकिन हां हमारी लड़ाई कांग्रेस की विचारधारा को बचाने के लिए है।

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