मधुमक्खियों को भा रहे कांठल के फूल

कांठल में पिछले वर्षों से परम्परागत खेती के साथ अब मधुमक्खी पालन की तरफ भी किसानों का रुझान बढऩे लगा है। कांठल में हरियाली अधिक होने से वर्षभर फूलों की उपलब्धता के कारण यहां मधुमक्खी पालन की वृह्द स्तर पर संभावना बनती है।


मौसम भी लग रहा अनुकूल
प्रतापगढ़
कांठल में पिछले वर्षों से परम्परागत खेती के साथ अब मधुमक्खी पालन की तरफ भी किसानों का रुझान बढऩे लगा है। कांठल में हरियाली अधिक होने से वर्षभर फूलों की उपलब्धता के कारण यहां मधुमक्खी पालन की वृह्द स्तर पर संभावना बनती है। हालांकि इसके लिए कृषि विज्ञान केन्द्र की ओर से गत वर्षों से किसानों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। लेकिन सभी किसानों की ओर से इसे व्यवसायिक स्तर पर नहीं अपनाया जा रहा है। इसे देखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र की ओर से प्रयास किया जा रहा है।
गौरतलब है कि कांठल में आबोहवा और नमी के कारण जहां हरियाली के कारण फूलों की उपलब्धता वर्ष पर्यंत रहती है। ऐसे में यहां मधुमक्खी पालन की भी अपार सम्भावनाएं है। इसे देखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र की ओर से गत पांच वर्षों से किसानों को मधुमक्खी पालन के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है। वहीं मधुमक्खी पालन के लिए मधुमक्खी व बॉक्स भी वितरित किए जा रहे है। कृषि वैज्ञानिकों की ओर से यहां के किसानों को जागरुकता और तकनीकी ज्ञान समय-समय पर उपलब्ध कराया जा रहा है।
अब तक साढ़े तीन सौ किसान प्रशिक्षित
कृषि विज्ञान केन्द्र की ओर से जिले में मधुमक्खी पालन की ओर रुझान बढ़ाने के लिए पांच वर्षों से प्रयास किए जा रहे है। वर्ष 2014-15 से किसानों को प्रशिक्षण देना शुरू किया गया। इसके तहत दो प्रशिक्षण में 61 किसानों को प्रशिक्षण दिया गया। इसके बाद वर्ष 2015-16 में दो प्रशिक्षण में 89 किसानों को प्रशिक्षण दिय गया। वर्ष 2016-17 में 14 किसानों को प्रशिक्षण दिया गया। वर्ष 2017-18 में 90 किसान, वर्ष 2018-19 में 85 किसानों को प्रशिक्षण दिया गया है।

जिले में इन इलाकों में अधिक सम्भावना
प्रतापगढ़ जिले के अरनोद, पीपलखूंट, धोलापानी, धरियावद क्षेत्र में जंगल का क्षेत्र अधिक है। ऐसे में यहां वर्षभर हरियाली पाई जाती है। पेड़-पौधे अधिक होने से फूल भी खिलते है। इस कारण मधुमक्खियों को फूलों से मकरंद आदि भी आसानी से मिल जाते है।
यह मधुमक्खी होती है फायदेमंद
अमुमन मधुमक्खियां चार प्रकार की होती है। जिसमें एपिस डोरसाटा, एपिस फ्लोरिया, एपिस मेलिफेरा, एपिस सिराना। इनमें से एपिस मेलिफेरा नामक मधुमक्खी का पाला जाता है। इसका कारण यह मधुमक्खी शांत स्वभाव की होती है। वहीं शहद उत्पादन की क्षमता भी अधिक होती है। प्रतिकूल मौसम में भी जीवित रह सकती है। जिले में भी इसी मधुमक्खी को बक्सों में पाला जा रह है।
किसानों को होता है दोहरा फायदा
मधुमक्खी पालन से किसानों को दोहरा फायदा होता है। मधुमक्खी पालन के साथ यह फसलों में परागण भी करती है। जिससे उत्पादन में वृद्धि होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार जिस क्षेत्र में मधुमक्खी पालन होता है। उस क्षेत्र के खेतों में 25-30 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है।
खुद की बनाई शहद की ब्रांड
निकटवर्ती पानमोड़ी गांव पानमोड़ी गांव का युवा किसान शैलेन्द्र पाटीदार गत तीन वर्ष से मधुमक्खी पालन कर रहा है। उसने हाल ही में शहद की ब्रांड के लिए लाइसेंस लिया है। अब वह शहद को पैकिंग कर बाजार में बेच रहा है। खुद के ब्रांड से शहद बिक्री हो रही है। जिससे अच्छा फायदा मिल रहा है।
होती है अच्छी आय
मधुमक्खी पालन से एक कॉलोनी से करीब चार हजार रुपए तक की आय होती है। वातावरण उपयुक्त होने पर एक कॉलोनी में एक वर्ष में 30 से 40 किलो तक शहद का उत्पादन होता है। इसे देखते हुए अन्य किसान भी इसे अपना रहे है।
जिले में किसानों को दिया जाएगा बढ़ावा
कांठल की जलवायु सम होने से यहां शहद उत्पादन की अच्छी सम्भावना है। इसे देखते हुए विभाग की ओर से 6 वर्ष से प्रयास किया जा रहा है। केवीके की ओर से अब तक करीब साढ़े तीन सौ किसानों को प्रशिक्षण दिया गया है। अब किसान भी इसमें रुचि दिखा रहे है। हमारा प्रयास रहेगा कि यहां अधिक से अधिक किसानों को शहद उत्पादन से रोजगार मिले। स्वयं सहायता समूह के माध्यम से मधुमक्खी पालन को बढ़ावा दिया जाएगा। जिससे किसानों को फसल के साथ अतिरिक्त आमदनी भी हो सकेगी।
डॉ. योगेश कनोजिया
प्रभारी, कृषि विज्ञान केन्द्र, प्रतापगढ़
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प्रतापगढ़ के पानमोड़ी में मधुमक्खी पालन के लिए लगाए गए बक्से।
प्रतापगढ़ के केवीके में मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण देते हुए।

Devishankar Suthar Reporting
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