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कम होती उर्वरा शक्ति, घट रहा उत्पादन

Decreasing fertility, decreasing production कम होती उर्वरा शक्ति, घट रहा उत्पादन

प्रतापगढ़

Published: April 18, 2022 05:53:38 pm


--अभी से नहीं चेते तो जमीन हो जाएगी बंजर
-कृषि विशेषज्ञ ने किसानों को दी जमीन सुधार और उत्पादन बढ़ाने की तकनीक
-पत्रिका से कृषि विशेषज्ञ का साक्षात्कार
प्रतापगढ़. कांठल में गत वर्षों से मिट्टी की उर्वरा शक्ति में कमी होने लगी है। जिससे रबी और खरीफ की फसलों का उत्पादन भी घट रहा है। ऐसे में किसानों को अब मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के प्रयास करने होंगे। इसके लिए पत्रिका से विशेष बातचीत में कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रभारी डॉ. योगेश कन्नोजिया आज की मौजूदा स्थिति को देखते हुए किसानों को कृषि में पार परिक तकनीक के साथ नई तकनीक अपनाने की सलाह दी है। गौरतलब है कि गत कुछ वर्षों से किसानों ने देसी खाद का उपयोग कम क दिया है। इसके साथ ही कीटनाशकों का भी अंधाधुंध प्रयोग किया जाने लगा है। इससे खाद्यान्न खराब हो रहा है। इसके साथ ही भूमि की उर्वरा शक्ति भी कम होती जा रही है। इस कारण उत्पादन भी कम होने लगाा है। इससे किसानों का खेती की तरफ से रुझान कम होता जा रहा है। इसके लिए पत्रिका की ओर से कृषि विज्ञान केन्द्र प्रभारी डॉ. योगेश कन्नोजिया से साक्षात्कार किया है।
सवाल- इस समय सभी खेत खाली हो गए हैं। वर्तमान समय में किसानों को क्या कार्य करना चाहिए?
जवाब- जिन खेतों में फसलें कट चुकी हैं और खेत खाली पड़े हुए हैं। उन किसानों को अपने खेत की मिट्टी का नमूना लेकर उसकी जांच अवश्य करवानी चाहिए। इससे किसानों को अपने खेत उर्वरा शक्ति के बारे में पता चलता है। मिट्टी की जांच के आधार परा ही किसानों को आगामी खरीफ में बोई जाने वाली फसलों में सिफारिश अनुसार खाद एवं उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए। जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ सके और कम लागत में अधिक उत्पादन हो सके।
सवाल- रबी की फसल की कटाई के बाद पराली जलाते हैं। ऐसे में खेतों में क्या प्रभाव होता है।?
जवाब-रबी की फसल की कटाई के बाद में जो किसान भाई पराली जलाते हैं, इससे खेतों की उर्वरा शक्ति कम होती है। ऐसे में किसानों को पराली नहीं जलानी चाहिए। इससे पर्यावरण और खेत को कई सारे नुकसान होते है। सर्वप्रथम तो जिस खेत में पराली जलाई जाती है, उस खेत के अंदर मौजूद सूक्ष्म तत्व और सूक्ष्य जीव जलकर नष्ट हो जाते हैं। साथ में खेत को जो जैविक पदार्थ खाद के रूप में मिलना चाहिए था। वह भी जलकर नष्ट हो जाता है। परिणामस्वरुप भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। दूसरी बात पराली जलाने से वायु प्रदूषण द्वारा पर्यावरण को भी बहुत नुकसान होता है। अत: किसान भाई पराली ना जलाकर इसे खाद बनाने में काम में ले सकते हैं। इसके लिए खेत में हंकाई और रोटावेटर कर इसे मिट्टी में मिला देना चाहिए।
सवाल- गर्मी के मौसम में किसानों को क्या कृषि कार्य करने चाहिए।
जावब- वर्तमान समय में किसानों को ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई अवश्य करनी चाहिए। इससे कई सारे लाभ मिलते हैं। प्रथम लाभ: गहरी जुताई से मिट्टी के अंदर मौजूद कीट पतंगों के अंडे नष्ट हो जाते है। दूसरा लाभ: गहरी जुताई से वर्षा का पानी खेत के अंदर जाता है।
सवाल- गत वर्षों से खेतों में गोबर की खाद देना कम हो गयाा है। ऐसे में भूमि सुधार के लिए किसानों को क्या करना चाहिए?
उत्तर 4:-किसानों को गर्मी में अंतिम जुताई के समय 200 किलो जिप्सम प्रति एकड़ की दर से जमीन में मिलाना चाहिए। इसके साथ ही सूक्ष्म पोषक तत्व भी देना चाहिए। जिससे खेत के उपजाऊपन में बढ़ोतरी होती है। पौधों को कैल्शियम और सल्फर जैसे पोषक तत्व भी मिलते हैं।
सवाल- गत वर्षों से अनाज भंडारण किए जाने के बाद भी कीड़े लग जाते है। इसके लिए क्या सावधानी रखनी चाहिए?
जवाब- यदि किसान जूट की बोरी में अनाज रखते है तो जहां तक संभव हो, नए बोरो का प्रयोग करें। अगर बोरे पुराने हैं तो उन्हें 1 प्रतिशत मैलाथियॉन के घोल में आधे घंटे भिगोंए तथा कड़ी धूप में 2 से 3 दिन तक उलट पलट कर सुखा लें। यदि बोरे कहीं से फटे हैं, तो उन्हें सिला ले। अनाज भरने के बाद बोरे का मुंह अच्छी तरह सिल दें। अनाज भंडारण की कोठी में डालते समय ध्यान रखना है कि कोठियों की भली-भांती सफाई कर ई.डी.बी. ए प्यूल का उपयोग करें।
सवाल- इन दिनों कई किसान ग्रीष्मकालीन सब्जियों की खेती करते है। ऐसे में उन्हें क्या सावधानी रखनी चाहिए?
जवाब- ग्रीष्मकालीन सब्जी में थ्रीप्स, सफेद मक्खी, फल मक्खी का प्रकापे अधिक होता है। इसके नियंत्रण के लिए डाइमिथोएट (30 ई.सी.) एक मिलीलीटर अथवा इमिडाक्लोरप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल का 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिडक़ाव करना चाहिए।
सवाल- रबी और खरीफ में उत्पादन कम होता जा रहा है। इसके लिए किसानों को क्या करना चाहिएï?
जावब-किसानों को फसल चक्र अपनाना चाहिए। इसके लिए प्रत्येक वर्ष खरीफ और रबी फसलों में बदल-बदलकर बुवाई करनी चाहिए। जिससे उत्पादन में प्रभाव नहीं होगा। इसके साथ ही पांच वर्ष में गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए। जिससे मिट्टी में आवश्यकता वाले पोषक तत्वों की कमी नहीं होगी।
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