कांठल में बढ़ रहा स्मार्ट कृषि का चलन

प्रतापगढ़.
कृषि के बढ़ते आधुनिकरण के साथ साथ कांठल का किसान भी स्मार्ट खेती और बढ़ रहा है। कांठल क्षेत्र में खरीफ में पारंपरिक फसल सोयाबीन, मक्का को छोडक़र किसानों का रुझान वाणिज्यिक कृषि व स्मार्ट कृषि की ओर बढ़ रहा है। किसान अब बून्द-बून्द सिंचाई पद्धति अपनाने लगे है। इसके साथ ही यहां के किसान अब मिर्ची, ऐप्पल बेर, अदरक, गेंदा फूल, कलकत्ती फूल व कई सब्जियों की बुवाई कर रहे हैं।

By: Devishankar Suthar

Published: 23 Jul 2021, 07:19 AM IST


-परम्परागत फसल के साथ व्यावसायिक और सब्जियों की खेती के प्रति बढ़ रहा रुझान
- मल्चिंग लगाकर खेती कर रहे कई किसान
प्रतापगढ़.
कृषि के बढ़ते आधुनिकरण के साथ साथ कांठल का किसान भी स्मार्ट खेती और बढ़ रहा है। कांठल क्षेत्र में खरीफ में पारंपरिक फसल सोयाबीन, मक्का को छोडक़र किसानों का रुझान वाणिज्यिक कृषि व स्मार्ट कृषि की ओर बढ़ रहा है। किसान अब बून्द-बून्द सिंचाई पद्धति अपनाने लगे है। इसके साथ ही यहां के किसान अब मिर्ची, ऐप्पल बेर, अदरक, गेंदा फूल, कलकत्ती फूल व कई सब्जियों की बुवाई कर रहे हैं।
प्रतापगढ़ जिले में गत कुछ वर्षों से परम्परागत फसलों के साथ अब किसान स्मार्ट खेती की ओर बढऩे लगे है। जिससे किसानों की आमदनी बढ़ रही है। निनोर के प्रगतिशील किसान हेमंत सेन ने बताया कि राज्य सरकार के कृषि विभाग द्वारा समय-समय पर किसानों को स्मार्ट कृषि व बून्द-बून्द सिंचाई पद्धति के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। जिससे प्रोत्साहित होकर अपने खेत पर दो बीघा मल्चिंग सीट का प्रयोग किया।
कई प्रकार से फायदा
- बून्द-बून्द सिंचाई पद्धति का प्रयोग और मल्चिंग से कई प्रकार से फायदा होता है। इससे फसल को खरपतवार, कीड़े मकोड़े व बीमारियों से बचाया जा सकता है। इसके साथ ही पौधे के लिए उचित नमी भी रहती है। जिससे अधिक उपज प्राप्त होगी और अधिक उपज से ज्यादा आमदनी होगी।
=-ड्रिप के लिए मिला अनुदान
किसानों को ड्रिप के लिए अनुदान भी दिया जाता है। किसान ने बताया कि ड्रिपिंग सिस्टम के लिए सरकार द्वारा अनुदान मिला है। इसके लिए ऑनलइान आवेदन दिया जाता है।
किसाान ले रहे है अच्छी आमदनी
इस प्रकार की स्मार्ट खेती से किसान अच्छी आमदनी ले रहे है। इस मल्चिंग सीट से ने खेत में सामान्य मिर्ची, शिमला मिर्च, गेंदा फूल, टमाटर, ककड़ी, गराडू, सब्जियां की खेती की जा रही है। निनोर के अलावा खेरोट, वीरावली, बड़ी साखथली, दलोट समेत कई गांवों में किसान आधुनिक तकनीक से कृषि कार्य करके अच्छी आमदनी कमा रहे है।
यह हो रहा है खर्चा
किसानों ने बताया कि सामान्यत दो बीघा में ७० हजार का खर्चा होता है। १२ हजार का प्लास्टिक, १५ हजार के पौधे का खर्चा आता है।
खेती में रोजड़े बने चुनौती
क्षेत्र में गत वर्षों से खेती में सबसे बड़ी चुनौती रोजड़ों से हो रही है। किसानों ने बताया कि इसके बचाव के लिए खेत की तारबंदी ही उपाय है। लेकिन तारबंदी का खर्चा काफी महंगा होता है। जिससे किसान भी परेशान है।
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