प्रतापगढ़ के दो धुर विरोधी राजा भइया और प्रमोद तिवारी क्या सचमुच साथ आ गए हैं

प्रतापगढ़ के दो धुर विरोधी राजा भइया और प्रमोद तिवारी क्या सचमुच साथ आ गए हैं

एक दूसरे के कट्टर विरोधी दिग्गज हैं राजा भइया और प्रमोद तिवारी। इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है जिले की सियासत।

प्रतापगढ़. यूपी के प्रतापगढ़ के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब दो धुर विरोधी एक साथ आ गए हैं। या फिर यूं कहें कि उन्हें परिस्थितियों ने साथ आने पर मजबूर कर दिया है। दोनों एक दूसरे के प्रभाव क्षेत्र में बिल्कुल दखल नहीं दे रहे। ऐसा कहा जा रहा है। पर क्या सच में ऐसा है, यह सवाल उन सबके मन में है जो राजा भइया और प्रमोद तिवारी की रार के बारे में जानते हैं। इस बात को जानने की उत्सुकता सियासी गलियारों और जनता में इसलिये भी कही जा सकती है, क्योंकि दोनों खामोश हैं और एक दूसरे के बार में कुछ नहीं बोल रहे। दोनों के प्रभाव वाली सीटों कुण्डा और रामपुर खास में एक दूसरे का कोई दखल भी नहीं है।




दरअसल प्रतापगढ़ की राजनीति को जानने के लिये वहां के कद्दावर कांग्रेसी नेता रहे राजा दिनेश सिंह व राजा अजीत प्रताप सिंह का नाम लेना जरूरी है। यहां विश्वसेन राजपूत राय बजरंग बहादुर सिंह जिनके वारिस राजा भइया हैं और दूसरा सोमवंशी राजपूत राजा प्रताप बहादुर सिंह बड़े नाम हैं। एक और परिवार है राजा दिनेश सिंह का जो दिग्गज कांग्रेसी रहे। उन्हें इंदिरा गांधी ने अपने कैबिनेट में जगह भी दी। उनकी विरासत संभाल रही हैं पुत्री रत्ना सिंह। रत्ना सिंह प्रतापगढ़ से संसद भी रहीं पर 2014 के चुनाव में वह हार गयीं। उन्हें कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी का संरक्षण प्राप्त है। जबकि राजा भइया निर्दल चुनाव लड़ते हैं और ऐसा कहा जाता है कि वह सियासी दांव चलने में खुद पर ही भरोसा करते हैं।




वर्तमान समय में प्रतापगढ़ की राजनीति राजा भइया और प्रमोद तिवारी के इर्द-गिर्द ही घूमती नजर आती है। दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी माने जाते रहे हैं। राजा भइया जहां पिछले पांच बार से लगातार कुण्डा से निर्दलीय विधायक होते चले आ रहे हैं। वहीं प्रमोद तिवारी कांग्रेस के टिकट पर रामपुर खास सीट से लगातार नौ बार विधायक रहे और इसके बाद उन्होंने यह सीट बेटी आराधना मिश्रा को दे दी जो वहां से वर्तमान समय में विधायक हैं। वहां की सियासत के जानकार बताते हैं कि दोनों दिग्गजों के समर्थक कभी आपस में भिड़ जाया करत थे पर अब वह स्थिति नहीं रही।



ऐसा कहा जाता है कि शायद दोनों में कोई गुप्त समझौता हो चुका है। यही वजह है कि अब दोनों के समर्थक एक दूसरे से नहीं उलझते। दोनों एक दूसरे के रास्ते में नहीं आते। न प्रमोद तिवारी राजा के गढ़ कुण्डा विधानसभा सीट और बगल की बाबागंज में कोई खास दखल रखते हैं और न ही राजा भइया उनकी विधानसभा रामपुर खास आदि में कोई अड़ंगा लगाते हैं। हालांकि दोनों आज तक कभी साथ नहीं आए। ऐसी स्थिति तब भी बनी हुई है जब अखिलेश और राहुल मिल गए, सपा-कांग्रेस का गठबंधन हो गया। दोनों एक दूसरे के लिये एक वोट तक मांगने नहीं गए।



हालांकि राजा भइया के कुण्डा विधानसभा क्षेत्र में तो सियासी माहौल तकरीबन वैसा ही है जैसा पिछले चुनावों में रहा है, पर इस बार प्रमोद तिवारी के गढ़ रामपुर खास में उनके सामने रागेश प्रताप सिंह छोटे सरकार बड़ा चैलेंज बनते जा रहे हैं ऐसा वहां की राजनीति पर पैनी नजर रखने वालों का दावा है। छोटे सरकार वही व्यक्ति हैं जिनके बड़े भाई रमेश प्रताप सिंह रामपुर खास से ब्लॉक प्रमुख हैं। कहा जाता है कि वह प्रमोद तिवारी के विरोध के बावजूद प्रमुख का चुनाव जीते। आराधना मिश्रा के खिलाफ वहां से छोटे सरकार ने पिछला उपचुनाव लड़ा और महज पांच हजार वोटों से ही हारे। इस बार वह फिर बीजेपी के टिकट पर आराधना मिश्रा के खिलाफ हैं। सच यह है कि राजा भइया प्रतापगढ़ की हर सीटपर नजर बनाए रखे हैं पर वह प्रमोद तिवरी की न तो हिमायत कर रहे हैं और न ही मुखालफत।
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