रायबरेली के गंगाघाट पर संस्कृत सीखने आते है प्रदेश के अन्य जिलों से छात्र,लेकिन भाजपा सरकार में उपेक्षा का है शिकार

रायबरेली के गंगाघाट पर संस्कृत सीखने आते है प्रदेश के अन्य जिलों से,लेकिन भाजपा सरकार में उपेक्षा का है शिकार

कांग्रेस सांसद निधि से मिलता है सहयोग, लेकिन योगी सरकार से अभी तक नहीं मिला अनुदान

कमजोर छात्र भी यहां फर्राटे के साथ बोलने लगते हैं संस्कृत ।

उपेक्षा कि शिकार संस्कृत भाषा से अपना जीवन सवांर रहे छात्र ।

By: Madhav Singh

Published: 01 Jul 2020, 05:11 PM IST

रायबरेली . देश जहां डिजिटल की ओर बढ़ रहा हैं। वहीं आज भी भारत देश की संस्कृति और संस्कृत को बचाने और बढ़ाने का काम मठ में पढ़ाने वाले गुरु लोग कर रहे है। ऐसा ही डलमऊ गंगा घाट पर ऋषि मुनियों की संस्कृत भाषा वैदिक मंत्रों का आदिकाल से संरक्षण करती आई है। प्राचीन भाषाओं में संस्कृत का सर्वोच्च स्थान है। विश्व साहित्य की पहला वेद ऋग्वेद इसी भाषा का रत्न है। भारतीय संस्कृति का रहस्य इसी भाषा में निहित है। लेकिन भाजपा सरकार के आने से मठ के लोगों को काफी उम्मीद थी योगी सरकार से, लेकिन संस्कृत विद्यालय को किसी भी प्रकार से कोई सहायता नही मिली है। जबकि जब से इसकी स्थापना हुई है, कांग्रेस पार्टी की सांसद निधि से धन मिलता रहा है।


मठ के गुरु छात्रों को दे रहे यह ज्ञान

डलमऊ बड़ा मठ में चल रहा गुरुकुल शिक्षा पद्धति विद्यालय सरकार द्वारा वित्तपोषित है । यहां प्रारम्भ में 6 शिक्षकों की तैनाती शासन द्वारा की गई थी । समय के साथ साथ शिक्षक सेवा निवृत्त होते गए वर्तमान में एक शिक्षक के सहारे ही विद्यालय संचालित हो रहा है । उक्त विद्यालय में 120 छात्र पंजीकृत हैं , जिन्हें पढाने के लिए सिर्फ एक शिक्षक है । शिक्षकों की कमी को देखते हुए मठ के संन्यासियों ने बच्चों को पढ़ाने का बीणा उठा लिया । मठ के सन्यासियों द्वारा बच्चों को वेदों, शास्त्रों, उपनिषदों, व कर्मकांड़ों का बोध कराया जाता है ।

यहां कराया जाता है वैदिक व कर्मकांड़ों का बोध

डलमऊ बड़ा मठ में शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र प्रातः 4 बजे गंगा स्नान कर देववाणी में मंत्रों का उचारण करते हैं । उक्त मठ में संचालित गुरुकुल में शिक्षा के साथ ही वेदों, उपनिषदों, गीता, कर्मकांड़ों, का बोध कराया जाता है। उक्त गुरुकुल में शिक्षा गृहण करने वाले छात्र देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी वैदिक साहित्य का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। नई सरकार में योगी आदित्य नाथ के मुख्यमंत्री बनने से मठ के संस्थापक को एक उम्मीद जगी थी कि पूर्व सरकार में सभी विभागों में उर्दू अनुवादकों की नियुक्ति की गई थी । उसी तर्ज पर संस्कृत भाषा के उत्थान की आवश्यकता है । सरकार को संस्कृत के उत्थान पर ध्यान देना चाहिए, जिससे संस्कृत की ओर लोगों का आकर्षण बढे ।

गुरुकुल में रहकर शिक्षा गृहण करते हैं छात्र

डलमऊ बड़ा मठ में संचालित गुरुकुल शिक्षा पद्धति विद्यालय में सुदूर जनपदो के एवं जिले के करीब 120 छात्र रहकर वैदिक व कर्मकांड़ों की शिक्षा गृहण कर रहे हैं । जिनका पालन पोषण मठ अपने निजी श्रोतों से कर रहा है ।

सरकारी योजनाओं का नहीं मिल रहा लाभ,विद्यार्थियों का झलका दर्द

डलमऊ बड़ा मठ में संचालित विद्यालय में अध्ययन करने वाले छात्र सरकार द्वारा चलाई जा रही मध्यान भोजन योजना, छात्रवृत्ति योजना, ड्रेस, पुस्तकों आदि से वंचित हैं। डलमऊ बड़ा मठ में शिक्षा गृहण कर रहे अमन मिश्रा ने बताया कि संस्कृत विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति का लाभ नहीं मिल रहा । सूरज मिश्रा ने बताया कि संस्कृत विद्यार्थियों को शिक्षकों की कमी के कारण शिक्षा गृहण करने में परेसानियों का सामना करना पड़ रहा है । वहीं सत्यम तिवारी से डलमऊ बड़ा मठ में संस्कृत साहित्य व वैदिक कर्मकांड़ों का अध्ययन कर रहे हैं , लेकिन शिक्षकों की कमी के कारण उनकी शिक्षा बाधित हो रही है । मठ के छात्र अमित गिरी ने कहा कि संस्कृत विद्यार्थियों के हित के लिए अधिकारियों को आवश्यक कदम उठाने चाहिए । छात्र राजेंद्र द्धिवेदी ने कहा कि संस्कृत साहित्य को बढावा देने के लिए सरकार को ध्यान देना चाहिए । क्योंकि संस्कृत भाषा वेद पुराणों की जननी है ।

महामण्ड़लेश्वर स्वामी देवेंद्रानन्द गिरि

गुरुकुल के संस्थापक स्वामी देवेंद्रा नन्द गिरि ने बताया कि विद्यालय के प्रारम्भ के दौरान प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी तब संस्कृत भाषा को लेकर नए कानून बने लेकिन समय के साथ साथ सरकारें बदली, सरकारों की तुष्टीकरण नीति कारण संस्कृत भाषा की उपेक्षा होती चली गई । उपेक्षा के कारण छात्रों ने भी संस्कृत की ओर से मुख मोड़ना शुरु कर दिया । आज हालत यह है कि जो बच्चे पठन पाठन में कमजोर होते हैं उन्हें ही परिजन गुरुकुलों व संस्कृत विद्यालयों में प्रवेश दिला रहे हैं । संस्कृत साहित्य को बढाने के उद्देश्य से विद्यालय की स्थापना की थी । लेकिन सरकारों के द्वारा की गई संस्कृत भाषा की उपेक्षा से मन दुखित है । सरकार को सभी प्राथमिक व जूनियर विद्यालयों में एक संस्कृत अध्यापक की नियुक्ति करनी चाहिए ।

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