शहीदों ने शहादत स्वीकार की पर ब्रिटिश हुकूमत से रायबरेली के स्वाधीनता सेनानी डरे न झुके

शहीदों ने शहादत स्वीकार की पर ब्रिटिश हुकूमत से रायबरेली के स्वाधीनता सेनानी डरे न झुके

Akansha Singh | Publish: Aug, 10 2017 07:45:00 AM (IST) | Updated: Aug, 10 2017 08:37:00 AM (IST) Raebareli, Uttar Pradesh, India

भारत के राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम मेें 1942 का भारत छोड़ों आंदोलन, जिसे अगस्त क्रान्ति की संज्ञा दी जाती हैं।

रायबरेली। भारत के राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम मेें 1942 का भारत छोड़ों आंदोलन, जिसे अगस्त क्रान्ति की संज्ञा दी जाती हैं। जन विद्रोह की ऐसी आंधी थी जिससे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को अपना बोरिया बिस्तर समेट कर भाग जाने के लिए विवश किया था। इस आन्दोलन में जबकि लगभग सभी राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रांतीय स्तर कम के नेता गिरफ्तार कर जेलों में डाले जा चुके थे, किसानों मजदूरों एवं छात्रों ने क्रांति की मशाल ली अपने हाथ में लेकर जलाए रखा और जीत हासिल की। इसलिये अगस्त क्रांति की तुलना 1789 को फ्रांस तथा 1917की रुसी क्रांति से की जाती है।

7 अगस्त 1942 को बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में स्वतंत्रता के लिए संघर्श करने का निर्णय किया। 8 अगस्त को ’भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित हुआ। 9 अगस्त की सुबह जनता को भारत छोड़ों प्रस्ताव व नेताओं की गिरफ्तारी की खबर मिली। इसका असर यहां के कांग्रेस नेताओं पर भी हुआ।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तथा 1920-21 के किसान आंदोलन की रणभूमि रायबरेली ने अगस्त क्रांति में बढ़ चढ कर भाग लिया। आन्दोलन प्रारंभ होते ही कांग्रेस के प्रमुख नेता राम स्वरुप मिश्रा, विषारद, मुंषी कालिका प्रसाद, लाल सुरेन्द्र बहादुर सिंह, रामषंकर द्धिवेदी,पं0 अंजनी कुमार एडवोकेट, डा0 सच्चिदानंद, रामेष्वर प्रसाद आदि को उनके घरो से गिरफतार कर लिया गया।


कांग्रेस कमेटी के कार्यालय पर पुलिस ने कब्जा किर लिया। ग्रामीण अंचलों में कांग्रेस कार्यालयों को जब्त कर लिया गया तथा दल बहादुर सिंह, केदारनाथ पाण्डेय, दिवाकर षास्त्री, मौ0 तजमुल हुसैन, बाबा जागेष्वर गिरि, रामेष्वर सिंह, मुंषी सत्य नारायण आदि गिरफतार हो गए।

नेताओं की गिरफतारी के बाद आंदोलन की बागडोर छात्रों व नौजवानों ने संभाली । 11 अगस्त 1942 को कुर्री सुदौली की कोठी में हजारों छात्र एकतित्रत हो गए तथा 13 अगस्त को नगर में पूर्ण हडताल की। छात्र नेता श्रीकांत सिंह के नेतृत्त में 13 अगस्त 1942 को प्रातः 10 बजे महात्मा गांधी इंटर कालेज से छात्रों का जुलूस ‘ भारत माता की जय‘ महात्मा गांधी की जय‘ वन्दे मातरम् ‘ के गगन भेदी नारे लगाते निकला। जीआईसी के छात्र भी रास्ते में षामिल हो गए। जिले भर में जुलूस निकाले गए तथा हड़ताल हुई।

लालगंज स्टेशन तथा डाकखाने में तोड़फोड़ की गई जिसमें अनेक लोग गिरफ्तार गिए गए तथा उन्हें सजा दी गई। गौरा व जलालपुर के छात्रों ने गौरा डाकघर व जलालपुर धई स्टेशन पर तोड़फोड़ की। घोरवारा तथा बछरांवा मे हड़ताल हुई। अम्बर वीरन का पुरवा में हर घर से पुरुशों तथा तथा महिलाओं ने गिरफ्तारी दी। भूमिगत लोगों को टीका के पुरवा के जमीदार पं0 षिवकुमार मिश्रा ने लोननदी के किनारे के जगंलों में शरण दी। अधिकांश भूमिगत क्रांतिकारी यहीं से अपनी गतिविधियों का संचालन करते थें । रायबरेली में अगस्त क्रांति का सबसे चमकता बिन्दु सरेनी गोली काण्ड है।

गुत्तार सिंह के नेतृत्व में 11 अगस्त 1942 को सरेनी बाजार में हड़ताल और 30 अगस्त को थाने पर झण्डा फहराने का निष्चय किया गया। परन्तु कुछ उत्साही युवकों ने 18 अगस्त को ही थानेपर झण्डा फहराने का निर्णय किया। हजारों की भीड़ के साथ युवक थाने की ओर बढ़े। पुलिस ने गोलियों की बौछार की जिसमें औदान सिंह, तिरी सिंह, सुक्खू सिंह, महादेव, रामषंकर द्धिवेदी, षहीद हो गए।

सरेनी गोलीकाण्ड के बाद गुप्तार सिंह, रामऔतार सिंह गिरफतार हो गए और उन्हे एक वर्श का कठोर कारावास का दण्ड मिला। उनका दायित्व पं0 महावीर पाण्डेय ने सम्भाला और वह फरार कार्यकर्ताओं से मिले । बछरांवा में चन्द्रिका प्रसाद व जितेन्द्र नाथ, हरचंदपुर में चद्रपाल बाजपेई व कालीशंकर भारती सक्रिय रहे। 9 अक्टूबर 1942 को हरचन्दपुर में किसानों की विषाल सभा में नेताओं ने लगानबंदी की सलाह दी पर वे गिरफतार कर लिये गए।

1944 की समाप्ति तक जनपद के प्रायः सभी नेता जेल में बंद हो गए। सबसे अंतिम गिरफ्तारी 1942 से फरार चल रहे महावीर प्रसाद पांडेय व मुंषी चंद्रिका प्रसाद की हुई। नेताओं की गिरफतारी के बाद पुलिस ने जनता पर जो कहर बरपाया उससे 1857 में हुए दमन की यादे ताजा हो गई परन्तु रायबरेली की जनता न तो डरी और झुकी और उसने भारत माता को विदेशी गुलामी से मुक्त करा कर ही दम लिया।

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