गांव बरौनाकुंडा की बदली तस्वीर: बदहाली की परतंत्रता से खुशहाली की स्वतंत्रता तक

गांव बरौनाकुंडा की बदली तस्वीर: बदहाली की परतंत्रता से खुशहाली की स्वतंत्रता तक
hoisted the flag upside down

Kanchan Jwala | Publish: Aug, 15 2015 08:50:00 PM (IST) Raigarh, Chhattisgarh, India

घरघोड़ा ब्लाक के इस गांव की बदहाली का आलम का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गांव में पहला टीवी 2011 में आया।

रायगढ़.(जयंत कुमार सिंह) 150 साल पुराने इतिहास वाले गांव बरौनाकुंडा की तस्वीर पिछले सालों में बदल चुकी है। गांव के लोगों ने यह साबित कर दिया है कि यदि जन आपस में मिल जाए तो अपनी ही नहीं पूरे गांव की तस्वीर बदली जा सकती है। घरघोड़ा ब्लाक के इस गांव की बदहाली का आलम का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गांव में पहला टीवी 2011 में आया।

गांव में औजार बैंक की स्थापना
गांव की लगभग 108 एकड़ जमीन परत थी जहां कोई खेती नहीं होती थी। अब स्थिति इसके उलट है। इस गांव में जहां कृषि के लिए उन्नत तकनीक का उपयोग किया जा रहा है वहीं कृषि विज्ञान केंद्र इस गांव में शोध कर रहा है। वहीं सबसे क्रांतिकारी सोच यह कि गांव में औजार बैंक की स्थापना की गई है। अब यदि गांव के प्रयासों की बात की जाए तो साल 200 9 -10 में गांव की बदहाली से परेशान 27 जागरुक लोगों के दल ने, जिसका नेतृत्व नकुल साय राठिया कर रहे थे एक दल बनाया। दल का नाम जागृति ग्राम योजना समिति रखा गया।

यह दल गांव के हर समस्या और मुद्दो पर चर्चा करता था। हर बैठक में एक मुद्दे को रखा जाता था। इसके बाद उस मुद्दे के समाधान की जिम्मेदारी कुछ लोगों को दी जाती थी। जिनका यह काम होता था कि इसका समाधान किस योजना या एजेंसी से होगा।

इसकी जानकारी मिलने के बाद ग्रामीण संबंधित एजेंसी और विभाग के पास पहुंच जाते थे और उसके पीछे तबतक लगे रहते हैं जब तक वह काम जाता है पूरा नहीं हो। ग्रामीणों ने अपने गांव के हालात बदलने के लिए एनजीओ, सरकारी विभाग सहित अंर्तराष्ट्रीय एजेंसियों की भी मदद ली है। उनका प्रयास सफल भी हुआ है। इसमें जनमित्रम कल्याण समिति, सरकारी विभाग सहित नाबार्ड शामिल है।

स्वास्थ्य पर जोर
जनमित्रम कल्याण समिति के रमाकांंत पाढ़ी ने बताया कि जब कृषि में सुधार हुआ, इनकी आमदनी बढ़ी तो ग्रामीणों की ओर से स्वच्छता पर ध्यान देने की शुरुआत की गई। गांव में पेयजल की व्यवस्था बदहाल थी, नालियों की हालत खराब थी। ग्रामीणों ने इसके लिए योजना की तलाश की और उस योजना के मदद से अधिकांश घरों में पेयजल के लिए टंकी निर्माण करवा लिया गया है इसके अलावा नालियों का सुधार किया गया श्रमदान से पानी के जमाव और गंदगी की समस्या को दूर किया।

स्वच्छता के सबंध में ताजा हालात यह है कि ग्रामीण अब कुपोषण को लेकर काफी जागरुक हैं। गांव में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार 60 से 70 प्रतिशत बच्चे कुपोषित थे। ग्रामीणों ने इस पर ध्यान दिया और अपने प्रयास और संगठन के योजना के अनुसार 20 प्रतिशत कुपोषण के स्तर को नीचे लेकर आए हैं। इसके अलावा गांव में उन्नत चूल्हा, का उपयोग किया जा रहा है।

रोजगार का जरिया
ग्रामीणों का पूर्णकालिक रोजगार कृषि है। जब कृषि की व्यवस्था सुधर गई और सम्मानजनक स्थिति में पहुंची तो रोजगार के अन्य विकल्पों की तलाश शुरू की गई। इसके लिए जनमित्रम के सहयोग से लाख का उत्पादन, लीज पर जमीन लेकर खेती और सब्जी के उत्पादन पर जोर दिया गया। अब कृषि के आमदनी के साथ अतिरिक्त आय अर्जित करने की स्थिति में ग्रामीण पहुंच चुके हैं। इतना ही नहीं ग्रामीणों ने किचन गार्डन की शुरुआत भी की है, रसोई के बेकार पानी से सब्जियों का उत्पादन अधिकांश रहा है घरों में हो। इसके अलावा गांव के उमेद साय के पांच एकड़ में ड्रिप एरिगेशन से खेती हो रही है जबकि इसके तीन आवेदन विभाग में लंबित हैं।

बना दिया औजार बैंक

ग्रामीणों की सबसे महत्वपूर्ण पहल गांव में औजार बैंक की स्थापना की है। हर किसान के पास कुछ न कुछ औजार था, ऐसे में सभीा आपस में मिले और एक बैंक की स्थापना कर दी। इसमें जनमित्रम की ओर से सहयोग किया गया। इसके बाद कृषि यंत्रों को किराए पर चलाने लगे, उससे जो आमदनी हुई उससे उन्नत कृषि यंत्र की खरीदी की गई, उसे भी किराए पर चलाया जा रहा है। वहीं कृषि के क्षेत्र में भी उन्नत तकनीक के इस्तेमाल की शुरुआत की। जिसका परिणाम यह हुआ कि जहां खेती होती थी वहां तो ठीक लेकिन जो 108 एकड़ भूमि परत थी उसमें सब्जी उगाना शुरू किया। इसमें एनजीओ, नाबार्ड, कृषि विभाग तीनों का सहयोग लिया गया। इसी गांव के ग्रामीणों ने इस साल पहली बार जिल़े को नासिक बनाने के लिए 600 क्विंटल प्याज का उत्पादन किया। हलंाकि दाम उन्हें नहीं मिल सका पर वो निराश नहीं हैं।

गांव में खुशहाली आई
टीम लीडर जीतराम राठिया ने कहा कि गांव की बदहाली को दूर करने के लिए 27 लोगों की कमेटी बनाई गई, कमेटी कृषि, आधारभूत संरचना, स्वास्थ्य, रेाजगार, परत भूमि विकास के लिए प्लान बनाई, इसके लिए योजनाओं और एजेंसियों की तलाश की गई। उनसे मदद लिया गया। आज हमारे प्रयास और उनकी मदद से गांव में खुशहाली है, हमारे गांव के 12 बच्चे इंगलिश मीडियम में पढ़ रहे हैं।

बेहतर है अनुभव
जनमित्रम कल्याण समिति के मनीष सिंह ने कहा कि ग्रामीण अपने गांव की बदहाली से परेशान थे। इन्होंने प्रयास किया, परिणाम यह हुआ कि किस योजना का गांव के लिए कैसे इस्तेमाल करना है यह बेहतर जानते हैं। वे यह नहीं देखते कि योजना विभाग की होगी, एनजीओ की होगी या फिर नबार्ड की होगी, ये उसमें लग जाते हैं और अपने गांव में उसे लागू करवा लेते हैं। इनके साथ काम करना बेहतर अनुभव है।


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