बंद हैंडपंप के आंकड़ों को देख कर खुश है पीएचई विभाग, आखिर इस खुशी के पीछे क्या है राज, जानें आप भी...

- विभागीय अधिकारी की मानें तो ग्राीष्मकालीन धान की खेती में 50 प्रतिशत की गिरावट आई है

By: Shiv Singh

Published: 07 Jun 2018, 01:42 PM IST

रायगढ़. गर्मी के दस्तक देने के साथ ही जिले में जल संकट की समस्या मुंह बाए खड़ी हो जाती है। गिरते जल स्तर के बीच एक-एक कर हैंंडपंप धोखा देने लगते हैं। पर इस बार पीएचई विभाग, बंद हैंडपंप के आंकड़ों को देख कर खुश है। विभागीय अधिकारी की मानें तो ग्राीष्मकालीन धान की खेती में 50 प्रतिशत की गिरावट आई है। जिसकी वजह से पिछले वर्ष की तुलना में इस बार जल स्तर में कम गिरावट दर्ज की गई है।

पिछले वर्ष की तुलना में भी इस वर्ष हैंडपंप कम बंद हुए है। ऐसे में, जिले में कहीं भी जल संकट की स्थिति नहीं है। इसका मतलब यह है कि सारंगढ़, बरमकेला और पुसौर में धान की खेती में कमी आई इसके कारण तमनार, घरघोड़ा जैसे औद्योगिक इलाकों में वाटर लेबल सामान्य हो गया। जबकि उन ब्लाकों में कोई फायदा नहीं मिला।

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पीएचई के इस दलील पर गौर करने वाली बात यह है कि जिले में गरमी के मौसम में धान की खेती पुसौर, बरमकेला और सारंगढ़ ब्लाक में ज्यादा होती है। तो इन ब्लाकों में धान की खेती में ५० प्रतिशत की गिरावट आने के बाद भी पेयजल के लिए हाहाकार की स्थिति है। सारंगढ़ में लोग तीन किमी दूर से पानी लाने को विवश हैं, पुसौर क्षेत्र में महिलाएं तेज धूप में तपती नदी को पार कर चुआं से पानी ला रही हैं। भरी दोपहरी में महिलाओं का झुंड, सूखी मांड नदी को पार कर पानी लेने को विवश है। पर कुछ आंकड़ों की बदौलत विभाग 'ऑल इज वेलÓ का राग अलाप रहा है।

पीएचई के अनुसार जल स्तर की वजह से इस बार १३५१ हैंडपंप बंद हुए हैं। जबकि पिछले वर्ष जल स्तर की वजह से करीब २६०० हैंडपंप बंद हुए थे। ऐसे में, इस बार जल संकट की समस्या अभी तक किसी गांव मेंं नहीं बनी है। पीएचई विभाग के आला अधिकारी बताते हैं कि सिर्फ पुसौर, बरमकेला, सारंगढ़ में ही जल स्तर नीचे हैंं। जहां सबसे अधिक ग्रीष्मकालीन धान की उपज की जाती है। शेष अन्य ब्लॉकों की स्थिति समान्य है। जबकि अन्य ब्लॉक तमनार, घरघोड़ा, खरसिया व रायगढ़ में बड़े-बड़े उद्योग है। जहां बड़े पैमाने पर भू-जल का दोहन किया जाता है वहां पर जल स्तर को समान्य बताया जा रहा है। पिछले दिनों पत्रिका ने मांड नदी के किनारे के बसे करीब आधा दर्जन गांव का दौरा किया था।

जहां पानी की समस्या अप्रैल माह के शुरुआति दिनों से ही शुरू हो गई है। दैनिक कार्य के लिए पानी की जरुरत को पूरा करने के लिए महिलाएं झुंड में सूखे मांड नदी को पार कर बाल्टी, गगरी व अन्य बर्तनों में पानी भर कर लाती है। उनकी माने तो यहां चिराग तले अंधेरा वाली स्थिति हैं। मांड नदी के किनारे बसने के बावजूद हम पानी की एक-एक बंूद के लिए तरस रहे हैं। गर्मी में पानी की एक बंूद के लिए परेशान होना पड़ता है तो बरसात में बाढ़ का पानी हमारे जनजीवन को प्रभावित करता है। इन हालात में विभाग की मान्यता भी कई प्रकार के सवाल खड़े कर रही है।

-धान की खेती में कमी के कारण पिछले साल की तुलना में जलस्तर कम गिरा है। इस बार कम हैंड पंप सूखे हैं। हलंाकि विभाग की नजर लगातार बनी हुई है- संजय सिंह, ईई, पीएचई

Shiv Singh Desk
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