पढ़ाई छोडऩे के साथ ही किताबों से बनी दूरी

पढ़ाई छोडऩे के साथ ही किताबों से बनी दूरी

Tabir Hussain | Publish: Feb, 15 2018 01:22:08 PM (IST) Raipur, Chhattisgarh, India

स्टूडेंट्स सिलेबस के बाहर पढऩे के लिए वक्त नहीं निकाल पा रहे। नौकरी पेशा पढऩे में टाइम जरूर दे रहा है लेकिन बहुत कम।

किताबें करती हैं बातें
बीते जमानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की, कल की
एक-एक पल की
खुशियों की, गमों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की

ताबीर हुसैन@रायपुर. सफदर हाशमी की यह कविता किताबों की महत्ता बयां करती है। मोबाइल क्रांति से किताबों के संसार में हलचल तो मची है बावजूद अस्तित्व बरकरार है। बिजनेस मैन के पास टाइम नहीं है पढऩे के लिए। स्टूडेंट्स सिलेबस के बाहर पढऩे के लिए वक्त नहीं निकाल पा रहे। नौकरी पेशा पढऩे में टाइम जरूर दे रहा है लेकिन बहुत कम। पत्रिका के सर्वे में यह बात सामने आई कि लोग जरूरत के हिसाब से पुस्तक पढऩा पसंद कर रहे हैं। स्पेशली टाइम निकालकर बुक्स पढऩे में उन्हें इंटरेस्ट नहीं है।

कॉम्पिटेटिव और जीके में ध्यान
सेंट्रल लाइब्रेरी और वृंदावन में मौजूद यूथ से बात करने पर यह निष्कर्ष सामने आया कि वे अपने सिलेबस से रिलेटेड बुक्स पढ़ते हैं। कभी वक्त मिला तो मोटिवेशनल बुक पढ़ लेते हैं। यहां कॉम्पिटेटिव एग्जाम देने आए यूथ बुक्स की वैल्यू तो समझते हैं लेकिन उनके पास टाइम की कमी है।
हायर सेकंडरी के स्टूडेंट्स की बात करें तो वे चाहकर भी सिलेबस से बाहर नहीं निकल पा रहे। स्कूली किताबों को पढऩे में ही इतना वक्त लग जाता है कि दीगर किताबों के लिए सोच नहीं पाते।
वक्त नहीं मिलता
बिजनेसमैन के अपने तर्क हैं। उनका कहना है कि वैसे तो बुक्स पढऩे के लिए टाइम नहीं है, लेकिन कोई किताब जरूरी लगे तो समय निकालना पड़ता है। बड़े बिजनेस मैन किताबें पढ़ते हैं चाहे वह आध्यात्म की ही क्यों न हो। जबकि छोटा बिजनेस करने वालों ने दो टुक कहा कि उनके पास टाइम नहीं है।
कॉलेज के बाद नहीं पढ़ी कोई बुक

जिन लोगों को कॉलेज छोड़े बरसों हो गए हैं वे आज तक एक भी किताब नहीं पढ़ पाए। उनका कहना है कि हमने खुद को कामकाज या अन्य मनोरंजन के साधनों में व्यस्त कर लिया कि कभी किताबों की ओर रुचि ही नहीं जागी।

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