scriptbus driver's daughter durga won gold in international boxing | बस ड्राइवर की बेटी दुर्गा ने इंटरनेशनल बॉक्सिंग में जीता गोल्ड | Patrika News

बस ड्राइवर की बेटी दुर्गा ने इंटरनेशनल बॉक्सिंग में जीता गोल्ड

गरियाबंद के छुरा की दुर्गा ने बातचीत में कहा- आपको खुद पर विश्वास है और रास्ते सही है तो जिद्दीपन जरूरी

रायपुर

Published: August 22, 2021 02:44:39 pm

ताबीर हुसैन @ रायपुर. अगर आपके रास्ते सही हो तो आपमें ये माद्दा होना चाहिए कि कोई कितना भी विरोध करे, आगे बढऩा है। सपने को पूरा करना है। जब मैं स्पोट्र्स की फील्ड में आई तो घर वालों का सपोर्ट नहीं था लेकिन मैं जिद्दी स्वभाव की हूँ। जो ठान लेती हूँ करके ही दम लेती हूँ। यह कहना है एसबीकेएफ इंटरनेशनल चौंपियनशिप 2021, नेपाल में बॉक्सिंग में (अंडर 50 केजी) गोल्ड मेडल जीतने वाली गरियाबंद के छुरा निवासी दुर्गा चंद्राकर का। गोल्ड जीतने के बाद दुर्गा ने रायपुर पहुंच मुख्यमंत्री से सौजन्य मुलाकात की। इस दौरान दुर्गा ने पत्रिका से खास बातचीत में खेल यात्रा को साझा किया।
बस ड्राइवर की बेटी दुर्गा ने इंटरनेशनल बॉक्सिंग में जीता गोल्ड
बस ड्राइवर की बेटी दुर्गा ने इंटरनेशनल बॉक्सिंग में जीता गोल्ड
पिता बस ड्राइवर, मां गृहिणी

दुर्गा ने बताया, मेरे पिता बस चलाते हैं लेकिन कोरोना के चलते उनका काम बंद है। मम्मी हाउसवाइफ हैं। छोटी बहन निजी हॉस्पिटल में नर्स है। भाई 2 बार क्रिकेट में स्टेट खेल चुका है। मुझे कुकिंग और डांस में भी रुचि है। अभी बीपीएड की पढ़ाई कर रही हूँ।
समर कैंप से हुई थी शुरुआत

5 साल पहले जब मैं बीए फस्र्ट ईयर में थी तब समर कैम्प ज्वाइन किया। यहां फिंगेश्वर के शिक्षक मुकेश श्रीवास ने कराते और किक बॉक्सिंग सिखाया। मैं वॉलीबॉल की नेशनल प्लेयर भी रह चुकी हूँ। किक बॉक्सिंग के साथ ही बॉक्सिंग की प्रैक्टिस करने लगी। मैंने चार नेशनल खेला जिसमें दिल्ली, कोलकाता, पुणे और रायपुर शामिल हैं।
नेपाल को दी मात, अब बैकांक का लक्ष्य

10 से 15 अगस्त के बीच पोखरा, नेपाल में आयोजित एसबीकेएफ इंटरनेशनल चौंपियनशिप में अंडर-30 आयुवर्ग में बॉक्सिंग में मेरा मुकाबला नेपाल से ही हुआ। अगले साल 2022 में बैकांक में एशिया कप में मैडल जीतना मेरा लक्ष्य रहेगा।
स्पॉन्सर की तलाश भी एक चुनौती

नेपाल आने-जाने के खर्च के लिए स्पॉन्सर तलाशना पड़ा। गुंडरदेही के विवेक चन्द्राकर स्पॉन्सर रहे। स्पॉन्सर ढूंढना एक चुनौती होती है। अगर शासन-प्रशासन से मदद मिल जाए तो अच्छा नहीं तो स्पॉन्सर की हेल्प करते हैं। वैसे यूनिवर्सिटी तक सरकार ही मदद करती है। यहां तक की ओलिंपिक में भी स्पॉन्सर तलाशना पड़ता है।

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