सरकार को भारी पड़ सकती है 2500 रुपए में धान खरीदी, समर्थन मूल्य से अधिक दाम देने से केंद्र ने किया मना

सरकार को भारी पड़ सकती है 2500 रुपए में धान खरीदी, समर्थन मूल्य से अधिक दाम देने से केंद्र ने किया मना

Akanksha Agrawal | Updated: 10 Jul 2019, 09:47:13 AM (IST) Raipur, Raipur, Chhattisgarh, India

केंद्र सरकार के एक अड़ंगे से 2500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान की खरीदी राज्य सरकार को भारी पड़ सकती है।

रायपुर. केंद्र सरकार (Central government) के एक अड़ंगे से 2500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान की खरीदी (Paddy purchase) राज्य सरकार (Chhattisgarh government) को भारी पड़ सकती है। बता दें कि केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को याद दिलाया है कि उन्होनें धान उत्पादन के लिए किसानों को प्रोत्साहन राशि दी तो वह उनका चावल खरीदनें को बाध्य नहीं होगा।

ऐसी ही चेतावनी केंद्र में भाजपा सरकार के आने के तुरंत बाद 2014 में जारी हुई थी। उसी के बाद भाजपा के नेतृत्व वाली तत्कालीन राज्य सरकार ने 300 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बोनस भुगतान से हाथ खींच लिया था।

खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के अफसरों का कहना है कि ऐसा डीसेंट्रलाइज्ड प्रोक्यूरमेंट स्कीम के तहत केंद्र और राज्य के बीच हुए समझौते की वजह से है। प्रगतिशील किसान संगठन के संयोजक राजकुमार गुप्त का कहना है, अगर केंद्र का ऐसा दबाव रहा तो राज्य सरकार के सामने दोहरी चुनौती होगी। जितना चावल केंद्र सरकार खरीदेगी वह उसी के मान से न्यूनतम समर्थन मूल्य का भुगतान करेगी।

इससे राज्य सरकार का बोझ बंट जाएगा। लेकिन जो चावल केंद्र नहीं खरीदेगा उसका पूरा भुगतान यानी 2500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से राज्य सरकार को ही करना होगा। दूसरी चुनौती बचे हुए चावल को सुरक्षित रखने की है। राज्य सरकार के पास भंडारण क्षमता नहीं है। इधर, राज्य सरकार संसाधनों पर पडऩे वाले बोझ को दूर करने के उपायों पर मंथन कर रही हैं। इसका क्या नतीजा निकलता है ये आने वाला वक्त बताएगा।

केंद्र-राज्य के बीच ऐसी है व्यवस्था
केंद्र सरकार की डीसेंट्रलाइज्ड प्रोक्यूरमेंट स्कीम के के तहत केंद्र सरकार ने 11 राज्यों से अनाज खरीदने का समझौता कर रखा है, इनमें छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तामिलनाडु, उत्तराखंड, कर्नाटक, केरल, आंध्रप्रदेश, बिहार और तेलंगाना जैसे राज्य शामिल हैं। राज्य सरकारें, केंद्र के लिए अपनी एजेंसियों के जरिए खरीदी कराती है। सर्वाजनिक वितरण प्रणाली, मध्यान भोजन, छात्रावासों को आपूर्ति जैसे समाज विकास कार्यक्रमों में इस्तेमाल के बाद बचा हुआ धान केंद्रीय कोटे में भारतीय खाद्य निगम के पास चला जाता है।

उसना चावल पर जोर लगा रहा केंद्र
बताया जा रहा है कि केंद्र सरकार ने अभी पूरी तरह से खरीदी से हाथ तो नहीं खींचा है, लेकिन चेतावनी के तौर पर अरवा चावल खरीदना बंद कर दिया है। पिछले सत्र में केंद्र ने केवल 24 लाख मिट्रिक टन उसना चावल खरीदा है। राजकुमार गुप्त कहते हैं कि 2015 में रमन सिंह की सरकार में ही इसकी शुरूआत हो चुकी है। जब राज्य सरकार ने 10 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से ही धान खरीदी का फैसला लिया था। विरोध के बाद इसे 15 क्विंटल तक लाया गया। उस कटौती के पिछे भी केंद्र सरकार ही थी।

खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम के सचिव डॉ कमलप्रीत सिंह ने बताया कि डीसीपी योजना के एमओयू की वजह से केंद्र का दबाव है। वे अभी केवल उसना चावल पर जोर दे रहे हैं। हमने कई बार उनसे केंद्रीय कोटे में लिए जाने वाले चावल की मात्रा 24 लाख मिट्रिक टन से बढ़ाकर 32 लाख मिट्रिक टन का आग्रह करते हुए पत्र लिखा है। चावल बचेगा, उसे यूनिवर्सल पीडीएस में लोगों को वितरित करने में इस्तेमाल किया जाएगा। इसके दूसरे उपायों के बारे में भी सोचा जा रहा है।

खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम मंत्री अमरजीत भगत ने बताया कि केंद्रीय खाद्य मंत्री (Central food minister) से मुलाकात का समय मांगा है। मुलाकात होगी तो उनसे पूरी चावल खरीदने का आग्रह किया जाएगा। एक अनुरोध पत्र भी लिख रहा हूं। उम्मीद है कि इसको सुलझा लिया जाएगा।

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