लोगों के तानों को किया इग्नोर, सुनी दिल की आवाज और बनीं मिसाल

लोगों के तानों को किया इग्नोर, सुनी दिल की आवाज और बनीं मिसाल
लोगों के तानों को किया इग्नोर, सुनी दिल की आवाज और बनीं मिसाल

Tabir Hussain | Updated: 06 Oct 2019, 04:45:49 PM (IST) Raipur, Raipur, Chhattisgarh, India

वर्ल्ड सेरेबल पॉल्सी डे पर कविता की सक्सेस स्टोरी

ताबीर हुसैन @ रायपुर। कमियों को मात देकर खुद को साबित करने वाले मुकद्दर के सिकंदर कहलाते हैं। सिटी की कविता पाठक पर ये बात बिल्कुल खरी उतरती है। निगेटिविटी का सामना करते हुए कविता ने हर उस व्यक्ति की जुबान में ताला लगा दिया जो कभी उसे बोझिल नजरों से देखा करते थे। मां हमेशा बेटी की ढाल बनकर डटी रही। लोगों के तानों को इग्नोर किया। मां को सुकून है कि बेटी ने एक मुकाम हासिल कर लिया। कविता बाय बर्थ सेरेबल पॉल्सी इस प्रॉब्लम से जूझ रही है। इतना ही नहीं उसने कैंसर को भी मात दी। छह महीने तक पेट के कैंसर से लड़ती रहीं। जब कीमो चल रहा था तो उसने एग्जाम भी दिया। पहाड़ जैसी परेशानियों को पार करते हुए उसने डबल एमए किया। पीजीडीसीए के बाद कोपलवाणी के स्पेशल बच्चों को कम्प्युटर सिखाया। अब वे बैंक ऑफ बड़ोदा में क्लेरिकल केडर की पोस्ट पर जॉब कर रही हैं।

लोगों के तानों को किया इग्नोर, सुनी दिल की आवाज और बनीं मिसाल

स्कूल में दाखिला नहीं मिल रहा था

कविता ने क्लास नाइंथ तक की पढ़ाई राजनांदगांव में की। इसके बाद उनकी फैमिली जबलपुर शिफ्ट हो गई। वहां स्कूलो में दाखिला मिलना मुश्किल हो गया। टीचर कहते थे कि इन्हें कुछ हो गया तो जिम्मेदार कौन होगा। पैरेंट्स भी निराश हो चुके थे। कविता ने प्राइवेट एग्जाम राइटर के माध्यम से दिया। कई तरह की समस्याओं से दो-चार होते हुए समाजशास्त्र और अंग्रेजी में एमए किया। पेट के कैंसर से जीती जंगएक समय ऐसा भी आया जब कविता को पेट का कैंसर हो गया। छह महीने तक इससे लड़ीं और कैंसर को हरा दिया। वे कहती हैं कि सेरेबल पॉल्सी से जूझना तो आदत में शुमार हो गया था लेकिन जब कैंसर का पता चला तो मेरी हिम्मत नहीं थी इससे लडऩे की। लेकिन हर बार की तरह इसका सामना करने के लिए भी पैरेंट्स ने हौसला बढ़ाया। हालांकि इसके इलाज के दौरान हुई तकलीफों को शब्दों में बता पाना कठिन है। कीमोथैरेपी के सेशन और मैंने बीए पार्ट वन का एग्जाम दिया।

आखिर मिली कामयाबी
कविता बताती हैं कि मैंने कई कॉम्पीटेटिव एग्जाम फाइट किए हैं। लेकिन सही राइटर नहीं मिलने की वजह से मैं हमेशा एक-दो नंबर से चूकती रही। दरअसल, कई सवालों के जवाब मुझे पता होते थे लेकिन राइटर को समझाने के चक्कर में वक्त निकल जाता था। इस बात का मुझे मलाल था। पीएनबी की परीक्षा में मेरे मुताबिक राइटर मिले और मैंने एग्जाम क्रेक कर लिया।

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