छत्तीसगढ़ी लोककला : दाऊ, देवार अउ दीवार

बिचार

By: Gulal Verma

Updated: 27 Jul 2020, 05:44 PM IST

देवार समाज के महिला अदाकारा म फिदा बाई, पद्यमा बाई, तार बाई, जयंती, बसंती, रेखा, माया, माला, पूनम अउ किस्मत बाई, सफरी मरकाम असन कईठिन नांव हे। जउनमन अपन सहज, सरल अभिनय, नाच अउ गायन ल मंादर के थाप, रूंझू, चिकारा साज के अवाज अउ गहना-पहनावा के संग लोक नाच करत देसी -बिदेसी दरसकमन ल मोहित कर देवंय। गुमनामी के अंधियार कोठरी म जियत देवार जाति के कला ल गांव-गली ले निकाल के जन-मन के बीच पहिचान बनइया गुनीजनमन के काम ह अजर-अमर बनगे हावय। दाऊ अउ देवार के मांझा पनपे दीवार ल गिरा के लोक संस्करीति जगत म देवार कलाकारमन बर मूड़ उठा के जिये लायक रद्दा दूनों दाऊमन बनाइन।
किसम- किसिम के लोककला अउ परंपरा के संगे -संग रीति-रिवाज के खदान छत्तीसगढ़ के भुइंया म भराय हे। ये राज के बहुत बड़े भाग म आदिवासी अउ अलग -अलग जनजाति रहिथे जउनमन पूंजीपति तो नइ रहय, फेर लोकगीत संगीत अउ नाच गायन म पोट्ठ रहिथें। छत्तीसगढ़ के अइसने जनजाति म देवार जात के तको गिनती होथे। छत्तीसगढ़ के इतिहास ह गवाह हे कि देवार जात के नचइया-गवइया-बजोइयामन मांदर, चिंकारा, रूंझु कस लोकबाजा के संगे-संग करमा नाच के कई किसिम ल मनमोहक ढंग ले करत छतीसगढ़ के नांव देस-बिदेस म बगराय हांवय।
अइसन जनजाति के कला, संस्करीति, नाचा-गम्मत के संगे-संग देवार कलाकारमन के बढ़हर खातिर दाऊ रामचंद देसमुख अउ दाऊ महासिंह चन्द्राकर के जबड़ हाथ हावय। दुरूग सहर के तीर म बसे गांव बघेरा के दाऊ देस मुखजी ह देवार-देवारिन कलाकारमन संग होवत उपेक्छा अउ अन्याय ल देख के उंकर कला के बढ़हर बर बछर 1976 म 'देवार डेराÓ बनाइस। देवार समाज के कलाकारमन ल जोड़ के 'आदर्स देवार पारटीÓ के मंच ले देवार समाज के मान बढ़ाय दर-दर भटकत देवार परिवार ल बने ठउर-ठिकाना देवाय के काम करिस। गांव-गली, खेत-खार ले देवार कलाकारमन ल उठा के बड़े-बड़े मंच अउ लिखइया, पढ़इया, गुनइया समाज के बीच देवार कलाकारमन के बिसेस पहिचान बनाइस।
दाऊ रामचंद देसमुख ह छत्तीसगढ़ के कला, संस्करीति अउ छत्तीसगढिय़ामन के मान-मरयादा ल बचाय अउ बढ़ाय के उदिम करत छत्तीसगढ़ के इतिहास म पहली घंाव बछर 1971 म 'चंदैनी गोंदाÓ जइसे बड़े मंच ल लेेके जनमन के बीच म आइस। ऐकर पाछू छत्तीसगढ़ के दाई-दीदी-बहिनीमन के मान-मरयादा ल कलंकित करइयामन के आंखी उघारे खातिर बछर 1984 म देवार कलाकारमन के संगे-संग दीगर जात के 50 -60 झन कलाकारमन ल जोड़ के लोकनाट्य 'कारीÓ के प्रस्तुति दिस।
अइसनेे दुरूग सहर के कछेरी के पीछू मील पारा म रहइया (मूलत: मतवारी गांव के) दाऊ महासिंह चंद्राकर ह तको देवार समुदाय के कलाकारमन ल मान-सम्मान दे बर अजर-अमर काम 'सोनहा बिहानÓ अउ लोकनाट्य लोरिकचंदा म करे रिहिस।
देवार समाज के माइलोगिन-पुरुस कलाकारमन ल जम्मो सुख-सुबिधा देवत उंकर भीतर समाय जनम जात कला ल सम्मान देवाय म दाऊ देसमुख अउ दाऊ चन्द्राकर के योगदान ल साक्छात देखे के अवसर मोला मिलिस हवय। ये दोनों दाऊमन ह अपन दरिया दिली ल देखावत दाऊ और देवार के बीच बने दीवार ल टोरे के काम करिन हवय। देवार कलाकारमन ल दुलार दे म भेदभाव करे बिना दूसर कलाकारमन कस एहूमन ल भरपूर मया -दुलार दीन।
घुमन्तू जाति देवारमन ल छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक, धारमिक नगरी रतनपुर के मूल रहइया माने जाथे। रायपुर, दुरूग अउ जांजगीर जिला म तको बहुत बड़े संख्या म इंकर निवास हावय। गांव-सहर के बाहिर उपेक्छित जिनगी जियइया देवार समाज म पारिवारिक लगसव संयुक्त परिवार के चलन आजो हावय। इही पाय के देवार संस्करीति, कला पीढ़़ी दर पीढ़ी चले आवत हे। गरीबी के संगे-संग रहे-बसे के सही ठिकाना नइ रहे, तभो ले अपन कला ल बचाय रखइया देवार जाति ल 'देवात्माÓ अउ देवार जाति के उत्थान बर काम करइया दूनों दाऊ ल 'महान आत्माÓ कहई सही होही।
इ तिहास जनइया सियानमन बताथे कि कोनो जमाना म छत्तीसगढ़ी लोकमंच म एकतरफा मरद (पुरुस) कलाकारमन के राज रिहिस। मंच म माइलोगिन (महिला) कलाकारमन के कोनो किसिम के भागीदारी नइ होवत रहिस। फेर, छत्तीसगढ़ के नदावत कला, संस्करीति ल बचाय के जतन म जुटे दाऊजी के कोसिस के बल म अइसन रिवाज ल टोर के अपन भीतर के कलाकारी ल मंच म देखाय के हिम्मत देवार समाज के महिला कलाकारमन करिन। संगे-संग दूसर समाज के महिला कलाकारमन ल तको आगू आय के रद्दा दिखाइन। देवार समुदाय के कलाकारमन अपन गायन, वादन, नाच के दम म अपन कला के लोहा कईठिन देस-बिदेस के मंच म मनवाय म कामयाबी पाइन। ये बूता म नामी नाट्य निरदेसक हबीब तनवीर के तको बिसेस योगदान हे।

Gulal Verma Desk
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