पुरातात्विक संपदा व प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है तुरतुरिया

वाल्मीकि आश्रम, गोमुख वैदही बिहार है दर्शनीय

By: Gulal Verma

Published: 08 Oct 2021, 05:18 PM IST

सेल। यहां से 32 किलोमीटर दूरी पर तुरतुरिया मातागढ़, वाल्मीकि आश्रम, लवकुश गोमुख वैदही बिहार, राम सीता शेर गुफा स्थित है। छत्तीसगढ़ अपनी पुरातात्विक सम्पदा के कारण आज भारत ही नहीं, विश्व में भी अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। यहां के 15000 गांवो में से 1000 ग्रामों में कहीं न कहीं प्राचीन इतिहास के साक्ष्य आज भी विद्यमान हैं, जो कि छत्तीसगढ़ के लिए एक गौरव की बात है। तुरतुरिया को सुरसुरी गंगा के नाम से भी जाना जाता है। यह प्राकृतिक दृश्यों से भरा हुआ एक मनोरम स्थान है, जो कि पहाडिय़ों से घिरा हुआ है। इसके समीप ही बारनवापारा अभयारण्य स्थित है। तुरतुरिया बहरिया नामक गांव के समीप बलभद्री नाले पर स्थित है। जनश्रुति है कि त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यहीं पर था और लवकुश की यही जन्मस्थली थी।
इस स्थल का नाम तुरतुरिया पडऩे का कारण यह है कि बलभद्री नाले का जलप्रवाह चट्टानों के माध्यम से होकर निकलता है तो उसमें से उठने वाले बुलबुलों के कारण तुरतुर की ध्वनि निकलती है, जिसके कारण उसे तुरतुरिया नाम दिया गया है। इसका जलप्रवाह एक लम्बी संकरी सुरंग से होता हुआ आगे जाकर एक जलकुंड में गिरता है जिसका निर्माण प्राचीन ईटों से हुआ है। जिस स्थान पर कुंड में यह जल गिरता है वहां पर एक गाय का मुख बना दिया गया है, जिसके कारण जल उसके मुख से गिरता हुआ दृष्टिगोचर होता है।
गोमुख के दोनों ओर दो प्राचीन प्रस्तर की प्रतिमाएं स्थापित हंै जो कि विष्णुजी की है। इनमें से एक प्रतिमा खडी हुई स्थिति में है तथा दूसरी प्रतिमा में विष्णुजी को शेषनाग पर बैठे हुए दिखाया गया है। कुंड के समीप ही दो वीरों की प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं बनी हुई है जिनमें एक वीर, एक सिंह को तलवार से मारते हुए प्रदर्शित किया गया है तथा दूसरी प्रतिमा में एक अन्य वीर को एक जानवर की गर्दन मरोड़ते हुए दिखाया गया है। इस स्थान पर शिवलिंग काफी संख्या में पाए गए हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन पाषाण स्तंभ भी काफी मात्रा में बिखरे पड़े हंै जिनमें कलात्मक खुदाई किया गया है।
सिरपुर के समीप होने के कारण इस बात को अधिक बल मिलता है कि यह स्थल कभी बौद्ध संस्कृति का केन्द्र रहा होगा। यहां से प्राप्त शिलालेखों की लिपि से अनुमान लगाया गया है कि यहां से प्राप्त प्रतिमाओं का समय 8-9 वीं शताब्दी है। आज भी यहां स्त्री पुजारिनों की नियुक्ति होती है जो कि एक प्राचीनकाल से चली आ रही परंपरा है। पुष माह में यहां तीन दिवसीय मेला लगता है तथा बड़ीी संख्या में श्रध्दालु यहां आते हैं। धार्मिक व पुरातात्विक स्थल होने के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह स्थल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

Gulal Verma Desk
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