चुनाव में विरोधी उम्मीदवार का गुण गाते हुए जब मंच पर रोने लगा था कांग्रेस का यह उम्मीदवार

चुनाव में विरोधी उम्मीदवार का गुण गाते हुए जब मंच पर रोने लगा था कांग्रेस का यह उम्मीदवार

Ashish Gupta | Publish: Sep, 16 2018 05:15:10 PM (IST) | Updated: Sep, 16 2018 05:15:11 PM (IST) Raipur, Chhattisgarh, India

केयूर भूषण जब बोलने खड़े हुए तो छत्तीसगढ़ आंदोलन पर धारा प्रवाह बोले। इस बीच संत कवि पवन दीवान का उल्लेख करते हुए वे भावुक हो गए।

रायपुर. बात 1999 की है। डॉ. खूबचंद बघेल के गांव पथरी में छत्तीसगढ़ की अस्मिता विषय पर एक विचार गोष्ठी हुई। केयूर भूषण, वासुदेव चंद्राकर और भूपेश बघेल गोष्ठी में वक्ता थे। संचालन परदेशीराम वर्मा ने किया था। केयूर भूषण जब बोलने खड़े हुए तो छत्तीसगढ़ आंदोलन पर धारा प्रवाह बोले। इस बीच संत कवि पवन दीवान का उल्लेख करते हुए वे भावुक हो गए। उनका गला भर आया वे आगे कुछ और बोल ही नहीं पाए। वहां बैठे लोग स्तब्ध थे और केयूर बच्चों की तरह फफक-फफक कर रो रहे थे।

उन्होंने रोते हुए कहा कि संत पवन दीवान जैसे छत्तीसगढ़ के सपूत को मैंने हराने का पाप किया है। सभा में सन्नाटा पसर गया। वहां बैठे लोग भी रोने लगे। पवन दीवान की पंक्ति भी याद हो आई हैं । तोर धरती तोर माटी रे भइया, तोर धरती तोर माटी। धरती बर, तो सबो बरोबर का हाथी का चांटी रे भइया तोर धरती तोर माटी।

केयूर भूषण जिस हार-जीत की बात कर रहे थे वह 1980 का लोकसभा चुनाव था। रायपुर क्षेत्र से केयूर भूषण कांग्रेस के उम्मीदवार थे तो पवन दीवान पृथक छत्तीसगढ़ पार्टी की ओर से उन्हें चुनौती दे रहे थे। दोनों ब्राह्मण, दोनों फकीर तबीयत के लोग। केयूर भूषण का चुनाव कार्यालय ब्राह्मणपारा में था, तो पवन दीवान का उससे लगे ही कुर्मी बोर्डिंग में। सभाओं में कविता पाठ और छत्तीसगढ़ की अस्मिता का अनुगायन दोनों ही करते थे।

कांग्रेस के प्रत्याशी केयूर भूषण चुनाव जीत गए। पवन दीवान चुनाव हारकर वापस राजिम चले गए। बाद में वे भी कांग्रेस में शामिल होकर दो बार महासमुंद के सासंद बने। लेकिन वह प्रतिद्वंद्विता उदाहरण बन गई। केयूर भूषण समतावादी आंदोलन और गुरूबाबा घासीदास के सिद्धान्तों के प्रतिबद्ध समाजसेवी थे।

छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला सासंद मिनीमाता उन्हें पुत्रवत् स्नेह देती थी। केयूर भूषण ने अपना मिश्रा सरनेम हटा लिया था। वे जाति विरोधी व्यक्तिथे। केयूर भूषण दाऊ रामचंद्र देशमुख को जीजा मानते थे। डॉ. खूबचंद बघेल की पुत्री राधा का ब्याह रामचंद्र देशमुख के साथ हुआ था। केयूर भूषण पूरी श्रद्धा के साथ झुककर दाऊ रामचंद्र देशमुख का चरण स्पर्श करते थे।

उन्होंने अपने आप को जातिमुक्तकर लिया था। उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। लेकिन जीतकर भी उन्हें यह मलाल रहता था कि छत्तीसगढ़ महतारी के सपूत तपस्वी कवि पवन दीवान को उन्हें हराकर जीतना पड़ा । डॉ. खूबचंद बघेल के आंदोलन में दोनों की प्रभावी भूमिका थी। लेकिन चुनावी युद्ध में आमने सामने आना पड़ गया । केयूर भूषण देश के अनोखे सांसद थे जो अपनी संसदीय क्षेत्र में साइकिल से दौरा करते थे।
(जैसा की वरिष्ठ साहित्यकार परदेशीराम वर्मा ने बताया)

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