दंतेवाड़ा विधानसभा की ग्राउंड रिपोर्ट: कासोली के शरणार्थी शिविरों को विधानसभा का इंतजार

दंतेवाड़ा विधानसभा की ग्राउंड रिपोर्ट: कासोली के शरणार्थी शिविरों को विधानसभा का इंतजार

Ashish Gupta | Publish: Oct, 13 2018 01:35:19 PM (IST) Raipur, Chhattisgarh, India

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में हर दिन बीतने के साथ चुनावी गर्मी बढती जा रही है। एक तरफ जहां संभावित उम्मीदवार अपना दिल थामे बैठे हैं वहीं आम नागरिकों को भी इंतजार है कि उनकी पसंदीदा पार्टी किन्हें टिकट देती है।

रायपुर. छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में हर दिन बीतने के साथ चुनावी गर्मी बढती जा रही है। एक तरफ जहां संभावित उम्मीदवार अपना दिल थामे बैठे हैं वहीं आम नागरिकों को भी इंतजार है कि उनकी पसंदीदा पार्टी किन्हें टिकट देती है। पत्रिका के आकाश शुक्ला की रिपोर्ट में जानिए दंतेवाड़ा का हाल।

दंतेवाड़ा जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ते - लड़ते थक चुके बस्तर के आदिवासियों को माओवाद के खिलाफ सलवा जुडूम अभियान का हिस्सा तो बनाया गया लेकिन उन्हें रोजी रोटी की चिंताओं से निजात दिलाने के कोई भी गंभीर कदम नहीं उठाये गए।नतीजा यह है कि सरकार के साथ मिलकर लाल आतंक के खिलाफ मोर्चा सँभालने वाले आदिवासी आज उसी सरकार की नीतियों से खफा हैं। वो कहते हैं, हम तो सिर्फ पीस रहे हैं। एक तरफ सरकार तो दूसरी तरफ माओवादी। विकास का पैमाना माने जाने वाले सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी सुविधाएँ दंतेवाडा के जिला मुख्यालय से कुछ ही किमी की दूरी पर जाकर खत्म हो जाती हैं।

दाने दाने को मोहताज...
एक दशक पहले दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 19 किमी दूर ग्राम पंचायत कासोली के शिविर में सलवा जुडूम अभियान के तहत माओवाद प्रभावित सैकड़ों लोगों को यहाँ लाकर बसाया गया। उनके रहने, खाने-पीने, स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा तक की सुविधाएं की गई। लेकिन आज स्थिति कुछ और है अपने घर जमीन, खेत, गाय, बैलों को छोड़ शिविर में शरणार्थियों की तरह रह रहे आदिवासियों को स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें तो दूर दाने-दाने के लिये मोहताज होना पड़ रहा है। अपनी खेती की जमीन होने के बावजूद यह लोग खेतिहर मजदूर बनकर रह गए हैं। लेकिन अफ़सोस यह हैं कि उन्हें मजदूरी का काम भी नहीं मिल पा रहा।

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प्राथमिक शिक्षा भी मुश्किल
कसोली और उसके आस पास के गाँवों की स्थिति का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि यहाँ प्राथमिक शिक्षा भी अब तक नहीं पहुँच पाई है। अनपढ़ युवा सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिये दिन रात जूझते रहे हैं बहरहाल विकास के आडम्बर के बीच सिर्फ आदिवासियों के साथ मजाक ही हो रहा है। जिला मुख्यालय के 5 किमी दायरे में ही सिमट कर रह जाने वाले विकास की हकीकत तब पता चलती है,जब चंद किमी दूर रह रहे आदिवासियों के जीवन में सिर्फ और सिर्फ अँधेरा दिखाई देता है।

ग्रामीणों को नहीं पता कौन है उनके गांव का सरपंच
कसोली के युवा सोनार यादव, मुन्ना अटन ने बताया कि जैसे तैसे 5वीं, 8वीं तक की पढाई कर ली। अब पेट भरने के लिये जहाँ जो मिल जाये रोजी मजदूरी कर के पेट पालते हैं। लेकिन इन बीहड़ अंचल में वो भी नसीब नहीं होता। स्वास्थ सुविधा तो यहां है ही नहीं। इलाज के लिये गीदम जाना पड़ता है या दंतेवाड़ा। लेकिन वहां भी पर्याप्त सुविधाएं नहीं है। चंद दिनों पहले यहाँ उप स्वास्थ्य केंद्र तो खोला गया। लेकिन वहां भी हफ़्तों हफ़्तों चिकित्सक नहीं आते हैं।

कसोली का गुड्डू कहता है 'साहब नदी पर निरम गांव से अपनी पुस्तैनी घर और 7 एकड़ जमीन सब छोड़ लाल आतंक के डर से यहाँ आया, कुछ समय राशन व अन्य सुविधाएं मिली, लेकिन अब स्थिति बदतर है। हमें अपना घर और खेत चाहिये'। दिनेश कुमार की हालत भी कुछ ऐसे ही थी, 2005 में पल्लवाया में 20 से 25 एकड़ खेत छोड़कर यहाँ मजबूरी में रहना पड़ रहा है, हमारे पास अपना कहने के लिये क्या है? न अपना घर रहा न अपनी जमीन। यहाँ तक आधे से अधिक ग्रामीणों को पूछने पर उन्हें ये भी पता नहीं, कि यहाँ का सरपंच कौन है ।

अभी पुनर्वास करना मुश्किल है
ग्राम पंचायत कासोली सरपंच मलिका अटामी ने कहा कि इंद्रावती नदी पर पुल बने बिना आदिवासियों का पुनर्वास नहीं किया जा सकता है। सुरक्षा की दृष्टि से वहां जवानों के कैम्प लगाना भी जरुरी है। आने वाले समय में ये पूरा किया जायेगा, जहाँ तक रोजगार की बात है, स्थिति तो चिंतनीय है, आदिवासियों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार व मूलभूत सुविधा देने के लिये आने वाले समय में सरकार काम करेगी।

दंतेवाड़ा विधायक देवती कर्मा ने कहा कि सरकार ने विकास के नाम पर आदिवासियों को सिर्फ ठगा है। हमारी सरकार आएगी तो सलवा जुडूम शरणार्थियों को पुन: उनके गांव में सुरक्षित बसाया जायेगा। हम आदिवासियों के हक़ के लिये हमेशा उनके साथ हैं।

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