जल हे त जिनगानी हे, जल नइ बचाहू, त जर जाहू!

जल हे त जिनगानी हे, जल नइ बचाहू, त जर जाहू!

Gulal Prasad Verma | Updated: 04 Jun 2019, 04:40:53 PM (IST) Raipur, Raipur, Chhattisgarh, India

का-कहिबे...

काबर दांत निपोरत हस रे जकला! बबा, तुंहर पुरखामन कइसे-कइसे हाना बनाय हे। सोच के घलो हांसी आथे। ऐदे किताब म लिखाय हे- 'चुरवा भर पानी म बूड़ मरवÓ। नानपन ले इही पढ़त-सुनत आवत हंव। फेर, समझ नइ आइस के ये हाना ल काबर बनइस होही! कतकोन बेर तो मेहा चुरवाभर पानी म बूड़े के उदीम घलो करे हंव। फेर, नइ बूड़ पायेंव। अइसे मेहा मरे बर नइ चाहत हंव। फेर, चुरवा भर पानी म बूड़ के कइसे मरथें, जेन ल अजमाय म का जाथे, ऐकर से परान तो निकलय नइ!
हत रे, जकला! जतके तो उमर बाढ़त जावत हे, ततके भोकवा होवत हस। हमर पुरखामन ए हाना ल वो लोगनमन बर बनाय हे, जेकरमन के आंखीं होथे, फेर अंधरा बने रहिथें। एक दिन वोमन खुदे बुड़थें अउ संग म अपन औलादमन ल तको बुड़ोथें। आज के पीढ़ी के मनखेमन अतेक नाकाबिल हावंय के अपन पुरखा के विरासत ल घलो संभाल नइ सकंत हें। हमन अपन पुरखामन के पांव के धुररा बरोबर नइअन। वोमन जउन गियान-बिग्यान, धरम, संस्करीति, संस्कार, परयावरन, सफ्फा हवा-पानी छोड़ के गे हावंय तेन ल मटियामेट करत हंन।
सुन रे भोकवा! एक जमाना म दू-तीन फीट के डोरी ले कुआं लेे पानी निकाल लेवत रहिन। आज उहां तीन सौ हाथ तरी म पानी पहुंच गे हे। सहर के कुआं मन ल कचरा डार के घुरवा बना दीन। तरिया ल पाट के मकान-दुकान बना दीन। इही हाल रहिही त एक दिन देसभर म लड़ई-झगरा, खून-खराबा होही। तीसरइया विस्व युद्ध पानी के खातिर होही कहिथें, तेनो ह सच हो सकथे। पियास मरत मनखे का रहिही? अभु घलो समे हे चेते के। नइ चेतहीं त जल बिना एक दिन जग ह जर जही!
हमन तो खुदे पानी के बइरी बन गे हन। पानी ल अइसे बउरथन, बरबाद करथन जइसे वोहा बेकार के जिनिस हे। का कभु कोनो सोचे रहिन के एक लीटर पानी ह एक कोरी रुपिया म बेचाही!
ए सब ह आबादी बाढ़े या फेर जादा पानी बउरे के सेती नइ होवत हे। बल्कि, ऐकर सेती होवत हावय कि हमन पानी ल सकेले, सहेजे के पुरखा जमाना के तौर-तरीका ल छोड़ देन। हमर पुरखा मन जानत रहिन 'जल हे त जिनगानी हेÓ, तेकर सेती वोला बचा के रखे खातिर कुआं, बावली, पोखर, तरिया बनाय रहिन। फेर, आज तो देसभर म बने बिचार, बने काम अउ पीये बर पानी के अकाल परे हे। जेन समाज म बने मनखे, बने बिचार अउ पीये बर पानी के अकाल हे, वो समाज ल बूड़ के मरे बर चुरवा भर पानी ह बहुत हे।
जब लोगनमन आंखी रहिके अंधरा होगे हें, दिमाग रहिके भोगवा बन गे हें। अपनेच गोड़ म कुदारी मारत हें। पियास लगथे तभेेच कुआं खोदथेंं, त अउ का-कहिबे।

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